Friday, July 4, 2014

उस 50 फीसदी आबादी के नाम

सिर्फ 12 साल की थी वो। हरी-हरी हिरनी जैसी आंखों वाली। मुहल्ले में गणपति पर हर साल डांस किया करती थी। मैं उसका नाम नहीं जानती हूं, ये भी नहीं जानती कि वो कौन थी, पर उसके बारे में सोनाली से सुना था कई बार। चार दिन पहले सोनाली ने बताया था कि रसोई में चाय बनाते हुए वो बुरी तरह जल गई। 75 परसेंट बर्न है, अस्पताल में भर्ती है।
यकीन मानिए सबसे पहला खयाल मुझे यही आया कि ये एक्सीडेंट नहीं सुसाइड की कोशिश है, और इसी से जुड़ा हुआ दूसरा खयाल ये कि इसका ज़िम्मेदार ज़रूर कोई हैवान है, जो आदमी के भेष में रह रहा है। और जब ये पता चला कि गैस का पाइप लीक होने की वजह से हादसा हुआ तो मुझे बहुत अफ़सोस हुआ। अफ़सोस उस बच्ची के लिए भी, और अपनी सोच के लिए भी,...लेकिन सबसे ज़्यादा अफ़सोस उस 50 फीसदी (अब शायद 50 फीसदी से ज़्यादा) आबादी के लिए हुआ जिसने अपोज़िट सेक्स वाली 50 फीसदी (50 फीसदी से कम ही) आबादी का भरोसा खो दिया है।
सोनाली, मेरी मेड भी है, मेरी दोस्त भी, और उसकी दुनिया में झांकने वाली मेरी खिड़की भी। वो अपने घर-परिवार, अपने आस-पड़ोस और अपने दोस्तों के किस्से मुझे इस तरह सुनाती रहती है कि मेरी भी अब उन लोगों से पहचान हो चली है। सोनाली कह रही थी कि “दीदी बहुत सुंदर थी वो”, और मैं सोच रही थी कि यकीनन सुंदर रही होगी, इसलिए नहीं कि उसकी आंखें हरी थीं, इसलिए नहीं क्योंकि उसका रंग गोरा था, बल्कि इसलिए....क्योंकि वो ज़िंदगी थी, उसके अंदर एक दिल धड़कता था, उसकी आंखों में एक सपना रहता था, क्योंकि उसे छुप्पन छुपाई खेलना अच्छा लगता था, क्योंकि उसे बारिश में भीगना पसंद था, क्योंकि वो अपने शरीर में हो रहे बदलावों के बोझ से दबी नहीं थी, क्योंकि एक दिन वो भी अपनी मां की तरह अपने परिवार का भार उठाना चाहती थी, क्योंकि वो भी अपनी क्लास में फस्ट आना चाहती थी,...क्योंकि वो ख़ुद से और इस दुनिया से प्यार करती थी। पिछले चार दिनों में सोनाली बताती रही कि वो बच्ची तकलीफ़ में है, अस्पताल में आखिरी सांसें ले रही है, और शायद इस यातना से जल्दी मुक्ति की प्रार्थना कर रही है। और आज उसने जो बताया, वो सुनने के बाद मैं सन्नाटे में हूं।
12 साल की वो बच्ची यातना सिर्फ अस्पताल में नहीं सह रही है, अस्पताल पहुंचने से पहले से, बहुत पहले से वो यातना झेल रही थी। उसका दिल धड़कता नहीं था बल्कि कांपता था तुम्हारे आने की आहट से, उसकी आंखों में कोई सपना नहीं था, वहां सिर्फ तुम्हारा डर पसरा रहता था, उसके शरीर में हो रहे बदलाव कुदरती प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे, वो तुम्हारे अत्याचार के गवाह थे, छुप्पन-छुपाई का खेल नहीं वो तुमसे अपना स्वाभिमान बचाने की लड़ाई लड़ रही थी, वो नफ़रत करती थी ख़ुद से, तुम से और इस दुनिया से भी,...इतनी नफ़रत कि इस दुनिया में रहना भी उसे गंवारा नहीं था। 12 साल की वो बच्ची जली नहीं थी, उसने खुद को जलाया था,...उसने वाकई ख़ुदकुशी की कोशिश की थी,...और उसकी ख़ुदकुशी के लिए वाकई वही हैवान ज़िम्मेदार था। हां, हैवान ही था वो। पांचवी क्लास में पढ़ने वाली एक बच्ची, जिसे सही तरीके से हिज्जे तक मालूम नहीं थे, उसे सुसाइड नोट लिखने के लिए मज़बूर करे, उसे इंसान कैसे कहूं मैं? अगर वो इंसान है, तो आज मैं ख़ुद को इंसान कहे जाने से इनकार करती हूं। मैं खुद को इन हैवानों के साथ एक ही स्पीसीज़ में रखे जाने का विरोध करती हूं।
इस बच्ची ने जो किया, वो अचानक हो गया कोई हादसा, गुस्से में उठाया गया कोई कदम नहीं था ये,....महीनों डर के साए में जीने, अपमान में जलने, तिल-तिल कर मरने के बाद उसने खुद को जला डालने का फ़ैसला किया होगा। 12 साल की ही सही, लेकिन उसके अंदर औरत का दिल था,...वरना वो यही आग वो उन लिज़लिज़े हाथों को लगाती जिसने उसे छुआ था, ये अंगारे वो उसके शरीर में भरती जिसने उसकी आत्मा को झुलसा दिया था। ये सिर्फ शरीर पर लगी आग नहीं थी, ये बददुआ थी उस मासूम की जो आज नहीं तो कल हम सबको लगेगी ज़रूर।
वो बच्ची ज़िंदा रहेगी या नहीं, वो अब कभी कुछ कह पाएगी या नहीं पता नहीं। पर उसकी तरफ़ से मैं उस 50 फीसदी आबादी से कुछ कहना चाहती हूं, जिसने धीरे-धीरे इस 50 फीसदी आबादी को इस मुकाम पर ला खड़ा कर दिया है। मैं जानती हूं कि तुम सब उस हैवान का प्रतिनिधित्व नहीं करते हो, मैं जानती हूं कि तुम्हारा और हमारा डीएनए करीब-करीब एक सा है, मैं जानती हूं कि तुम सब हमें सिर्फ सेक्स ऑब्जेक्ट नहीं समझते हो (या शायद समझते हो), लेकिन इवॉल्यूशन की प्रक्रिया में कुछ तो ग़लत हो गया है। मैं कई बार ख़ुद से पूछती हूं कि कहीं X और Y क्रोमोज़ोम्स के अलावा भी हम दोनों के डीएनए में कुछ और बदलाव तो नहीं आ गया है? वरना एक ही स्पीसीज़ के दो जेंडर्स के बीच इतनी बड़ी खाई कैसे बन जाती? खैर, कोई इमोशनल बात नहीं (वही इमोशन्स जिसे बाइ द वे तुम कई बार नाटक भी कह देते हो), नैतिकता की कोई दुहाई नहीं, दया की कोई भीख़ नहीं, सिर्फ कुछ सवाल हैं जो मैं अक्सर अपने आप से पूछती हूं, आज तुम खुद से पूछ कर देखो।
किसी लड़की को देखते ही उसपर जानवर की तरह टूट पड़ना (जानवर तो इतने वहशी कभी नहीं होते), दांतों से, हाथों से, नीयत से, आंखों से उसे नोंचना खसोटना, और ये ना कर सके तो अपनी कल्पना में उसके साथ बलात्कार करना। बस? यही करने के लिए मिली है तुम्हें ये ज़िंदगी? सोचो अगर इंसान होकर भी हमें यही करना होता, तो प्रकृति ने हमें ये दिमाग नहीं दिया होता, विकास की ये संभावनाएं नहीं दी होती,....हम भी जानवरों की तरह सिर्फ जी रहे होते और सेक्स कर रहे होते। तब तुम्हारे लिए ये किसी पर जंग जीत लेने जैसी बात नहीं होती, और हमारे लिए तिल-तिल कर मरने का सवाल भी नहीं। अगर ऐसा नहीं है तो इसका मतलब यही है कि अपोज़िट सेक्स वाला जीव सिर्फ सेक्स ऑब्जेक्ट नहीं होता।
तुम हमारे शरीर को अपनी जागीर समझते हो, तुम हमारी मर्ज़ी के बिना हमारे साथ कुछ भी कर सकते हो, तुम्हारी बात ना मानने पर तुम हमें टॉर्चर कर सकते हो। ऐसा कब होता है? तभी ना, जब हम सामने वाले को कमज़ोर समझते हैं, जब हमें लगता है कि हम उसपर हावी हो सकते हैं। बेअक्ल जानवर भी ऐसा नहीं करते। कभी सोचा है क्यों? क्योंकि एक ही स्पीसीज़ के दो जेंडर कभी एक दूसरे से कमज़ोर या ताकतवर नहीं हो सकते। ये प्रकृति का नियम है कि जो कमज़ोर है, वो ज़िंदा नहीं रह सकता,...और अगर एक जेंडर ख़त्म हो जाए (शारीरिक, मानसिक या मनोवैज्ञानिक रूप से) तो दूसरे जेंडर को ख़त्म होना ही पड़ेगा। शक्ति का संतुलन प्रकृति का सबसे बड़ा नियम है। और जब-जब सृष्ठि में शक्ति का संतुलन बिगड़ता है, तब-तब सिर्फ विनाश होता है। तो क्या अब भी तुम्हें लगता है कि हम कमज़ोर हैं?
हां कुछ कमज़ोरियां हैं हम में, हम इमोशनल हैं, कि हमारा दिल कोमल है, कि हमारी प्रायोरिटी में हमारा नंबर सबके बाद आता है। शायद इसीलिए हम सहती रहती हैं, कि तुम्हें तकलीफ़ ना हो, समाज में तुम्हारी इज़्जत बनी रहे। लेकिन जो दुनिया हमें सम्मान से जीने का हक़ नहीं दे सकती वो दुनिया बनी रहे या ख़त्म हो जाए, इससे जल्दी ही हमें फर्क पड़ना बंद हो जाएगा। ऐसी हैवानियत से तुम (तुम्हारे जेंडर के ये लोग) हमारी कोमलता को ख़त्म कर रहे हो, तुम हमारे अंदर से प्यार के स्रोत को सुखा रहे हो, और तुम्हें अहसास भी नहीं कि इससे सिर्फ हम नहीं तुम भी सफ़र कर रहे हो।  मैं नहीं जानती कि ये अवसाद है, सदमा है, सब कुछ ख़त्म हो जाने का अहसास है, या गुस्से की इंतिहां, लेकिन तुम मेरा भरोसा खोते जा रहे हो।
तुम्हारे जेंडर के कई लोग मेरे आसपास रहते हैं, जिन्हें मैं पापा, भाई, पति, दोस्त जैसे नामों से पुकारती हूं। मैं उन्हें जानती हूं, इसलिए उनसे प्यार करती हूं, उनपर भरोसा करती हूं। मुझे दुख़ है कि तुम्हारे आसपास रहने वाली मेरे जेंडर के लोग, उनपर भरोसा नहीं करते होंगे, ठीक वैसे ही जैसे मैं तुम पर भरोसा नहीं करती, क्योंकि मैं तुम्हें सिर्फ एक ख़तरे के तौर पर जानती हूं।
मैं तुमसे हम पर दया करने के लिए नहीं कह रही हूं, हमारी तकलीफ़ समझने के लिए नहीं कह नही हूं, ना ही हमारी जगह खुद को रखकर देखने के लिए कह रह हूं। तुम सिर्फ अपने लिए सोचो, और सोचो इतने लोगों के अविश्वास को लेकर जी पाओगे तुम? इतने लोगों के गुस्से और नफ़रत को झेल पाओगे तुम? और अगर नहीं तो अपनी 50 फीसदी आबादी के दिमाग में फैल रहे इस वायरस से तुम्हें भी लड़ना होगा। इस समाज में, इस सोच में, इस रवैये में आधी हिस्सेदारी तुम्हारी भी है, इसलिए इसे बदलने की आधी ज़िम्मेदारी तुम्हारी भी है। पर सवाल ये है कि क्या तुम इस ज़िम्मेदारी को निभाओगे? या यूं ही खड़े देखते रहोगे?


Saturday, April 25, 2009

और क्या कहूं?


कई दिन, या यूं कहूं कई महीने हो गए हैं कुछ भी लिखे हुए। ऑफिस में दो लाइन के वीओवीटी या चार लाइन के पैकेज लिख लेने मात्र को लिखना कैसे कहूं समझ में नहीं आता। लेकिन घर पर चाहते हुए भी कुछ लिख नहीं पा रही थी। ये शायद गुस्से की अधिकता है या सोच की, विचारों को शब्द ही नहीं मिल पा रहे थे। लेकिन थैक्स टू विनोद जी। जिनके ई मेल ने मुझे फिर से लिखने की प्रेरणा दी। पर्सनली तो विनोद जी को नहीं हीं जानती हूं लेकिन उनके ब्लॉग और मुझे भेजे गए उनके ई-मेल को पढ़कर इतना तो पता चल ही गया है कि वो बेहद पॉज़िटिव सोच रखते हैं। या शायद मैं कुछ ज़्यादा ही निगेटिव हो चली हूं। विनोद जी कहते हैं कि फिज़ा कोई दूध पीती, मासूम बच्ची नहीं है कि चांद मुहम्मद की बातों में आ गई। उनका मानना है कि जो हुआ उसके लिए फिज़ा और चांद मुहम्मद दोनों ही ज़िम्मेदार हैं। विनोद जी को मीडिया के रोल पर भी आपत्ति है। साथ ही इस बात से नाराज़गी भी कि इन बातों को मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है। बिल्कुल सही बात है। मैं पूरी तरह उनकी बात से सहमत हूं कि बात करने से ही बात बनेगी। इसलिए मुझे लगा कि उनकी आपत्तियों का जवाब देना बनता है। सबसे पहली बात फिज़ा की मासूमियत की बात...मैंने पहले भी कहा है कि मैं फिज़ा की समर्थक नहीं हूं। पहले तो मैं ये ही नहीं मानती हूं कि फिज़ा मासूम है, या उसे बहलाया-फुसलाया गया है। मेरा तो बस इतना कहना है कि ज़िम्मेदारी दोनों की है। और चांद मुहम्मद उससे पल्ला नहीं झाड़ सकता। दूसरी बात ये कि सवाल फिज़ा का है ही नहीं। सवाल महिलाओं का है, उनके आत्मसम्मान का है। और किसी को भी हक़ नहीं है कि वो इस आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाए
चांद और फिज़ा के बीच जो कुछ भी हुआ, वो उनका पर्सनल मामला है। ये विनोद जी भी मानते हैं कि जो हुआ उसके लिए चांद औऱ फिज़ा दोनों ज़िम्मेदार हैं लेकिन अगर गलती सिर्फ अनुराधा की भी होती तो भी क्या इसको आधार बनाकर महिलाओं के चरित्र पर अंगुली उठाना। ये कहना कि महिलाएं आगे बढ़ने के लिए पुरुषों का इस्तेमाल करती हैं। क्या ये जायज़ है? ये कहना कि महिलाओं को सब कुछ पका-पकाया मिल जाता है। क्या ये उनके साथ अन्याय नहीं है? घर और बाहर की दोहरी ज़िम्मेदारियों को निभाना और ज़रा सी चूक होने पर दोनों जगह ताने सुनना। क्या यही महिलाओं की नियति है। जब औरत घर से बाहर निकलकर ऑफिस जाती है तो पिता, पति या भाई को लगता है कि वो उन्हें इग्नोर कर रही है। बच्चे को टाइम नहीं दे रही है। सास-ससुर की सेवा नहीं कर रही है। और जब यही पिता, पति और भाई ऑफिस जाते हैं तो अपनी कुलीग को मैटरनिटी लीव मिलना वो अपने साथ अन्याय मानते हैं। मुझे सिर्फ इस दोहरे मापदंडों से आपत्ति है। औरत का अस्तित्व, उसकी आइडेंटी...क्या इसकी कोई जगह नहीं है पुरुषों की डिक्शनरी में। पिछले दिनों मीडिया में एक मामला खूब उछला था। गंगोलीहाट (जो कि मेरा घर है) की एसडीएम दीप्ती सिंह ने अपने पति के खिलाफ़ बदसलूकी और मार-पीट का मामला दर्ज कराया है। पिछले महीने जब मैं घर गई तो वहां हर ओर इसी बात की चर्चा थी। गंगोलीहाट एक छोटा सा कस्बा है, यहां बड़ी-बड़ी घटनाएं नहीं होतीं, इसलिए लोग छोटी-छोटी चीज़ों को ही बड़ा बना लेते हैं। फिर ये तो वहां की एसडीएम की बात थी। लेकिन मुझे हैरानी इस बात पर हुई की किसी की भी सहानुभूति दीप्ती के साथ नहीं थी। लोगों का कहना था कि ग़लती दीप्ती सिंह की है। जो कुछ लोगों की बातों से पता चला उसका सार ये है कि दीप्ती का पति खुद एक आईपीएस ऑफिसर है। परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ़ दोनों ने लव मैरिज की और जैसा कि नौकरीपेशा लोगों के साथ अक्सर हो जाता है, दोनों की पोस्टिंग अलग-अलग जगह हो गई। अब पति महोदय चाहते थे कि दीप्ती अपनी जॉब छोड़कर उनके साथ रहे। और जब दीप्ती ने उसकी बात नहीं मानी तो उसकी पिटाई कर दी गई। और ज़्यादा क्या कहूं बस इतना ही पूछना चाहती हूं क्या पति को खुश करने के लिए दीप्ती को अपनी ज़िंदगी भर की कमाई, अपनी ज़िंदगी भर की मेहनत, अपना नाम, अपनी आइडेंटिटी को कुर्बान कर देना चाहिए था। मैं खुश हूं कि दीप्ती सिंह ने ऐसा नहीं किया। हालांकि उसने ऐसा किया होता तो शायद उसकी इतनी आलोचना नहीं होती। लेकिन आगे बढ़ना है तो ये सब तो सहना ही होगा।
जहां तक बात मीडिया की है। मैं मानती हूं, मीडिया करीब-करीब हर मामले में बहुत ख़राब भूमिका निभा रहा है। मीडिया से जुड़ी होने की वजह से मैं खुद को भी इसके लिए ज़िम्मेदार मानती हूं। लेकिन मीडिया अब एक कारोबार बन गया है। वैसे देखा जाए तो ये खुशकिस्मती ही है कि मीडिया बिज़नेस है। और कारोबारी की नज़र सिर्फ प्रॉफिट पर होती है। जिस दिन दूसरों की ज़िंदगी में ताक-झाक करने से, सनसनी फैलाने से, तिल का ताड़ बनाने से और चटपटी, मसालेदार ख़बरों से प्रॉफिट मिलना बंद हो जाएगा, मीडिया ख़ुद बख़ुद सुधर जाएगा। हालांकि दिल से मैं यही मानती हूं कि मेरा तर्क खोखला है। मीडिया जिस स्तर पर आ गया है उसे उठाना बहुत मुश्किल है। लेकिन अपने-अपने हिस्से की छोटी-छोटी कोशिश तो हम कर ही सकते है।

Saturday, February 7, 2009

एक फिज़ा के बहाने


सोचा था इस मुद्दे पर कुछ नहीं लिखूंगी...क्योंकि अगर कुछ लिखा तो लोगों को बुरा लगेगा...लेकिन फिर सोचा मैं दुनिया की परवाह क्यों करूं? वैसे तो ये एक बहस भर थी...और बहस का विषय औरत हो तो क्या कहने। किसने क्या कहा ये नहीं लिखूंगी क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस इस बहस का नतीजा क्या निकला वो भर बता देती हूं। नतीजा निकला कि १- लड़कियां घरों को तोड़ती हैं. २-आज की पढ़ी लिखी लड़कियां पैसे वाले लोगों और खास कर राजनीति से जुड़े लोगों को फंसाती हैं फिर उनसे पैसे ऐंठती हैं. ३- कामकाजी लड़कियों को ना तो ढंग से काम आता है और ना ही घर संभालना. ४- कामकाजी लड़कियां सिर्फ अपनी मुस्कान और अदाओं का खाती हैं. ५- लड़कियों का क्या है जब तक बिना कुछ किए पैसा मिल रहा है तब तक नौकरी करो नहीं तो शादी कर लो. ६-लड़कियां अपने काम को सीरियसली नहीं लेती...और अगर डांट पड़ जाए तो दो आंसू टपकाए और बात खत्म। वैसे लिस्ट और भी लंबी हो सकती है लेकिन घुमाफिरा कर थीं यही बातें। ज़ाहिर है बहस में हिस्सा लेने वाले सभी पुरुष थे। बीच-बीच में मुड़कर मेरी ओर भी देख लिया जाता था...शायद इस उम्मीद में कि मैं कुछ बोलूं। लेकिन मैं कुछ नहीं बोली...और कुछ बोलने का फायदा भी क्या था?
बात शुरु तो अनुराधा बाली, माफ कीजिए...फिज़ा मोहम्मद से हुई थी...लेकिन खत्म...खैर छोड़िये।
फिज़ा तो वैसे भी आजकल हॉट टॉपिक है...फिज़ा के बहाने लड़कियों को नैतिकता, संस्कृति और सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले राजनीति में भी हैं और मीडिया में भी। कोई लड़की धर्म बदलकर किसी शादी-शुदा आदमी के साथ शादी कर ले...लड़का भी कौन? एक पूर्व मंत्री...यहीं तक होता तो चलो मान भी लेते, दोनों खुले आम अपने प्यार का इज़हार करते घूमते हैं...मीडिया को इंटरव्यू देते फिरते हैं। अब ये बात लोगों को कैसे हज़म होगी। पहली बार जब चांद मोहम्मद और फिज़ा ने मिलकर प्रेस कांफ्रेंस की थी तो सभी न्यूज़ चैनल वालों की बाछें खिल गई कि चलो आज का मसाला मिल गया। मेरे एक सहयोगी ने तब भी कहा था यार ये तो बड़ी चालू चीज़ है। और अब जब कि फिज़ा चांद मोहम्मद की पोल पट्टी खोलने पर तुली हुई है तो मेरे वही सहयोगी बड़े गर्व से कहते हैं देखो मैने पहले ही कहा था ना बड़ी चालू चीज़ है....। हां चालू है फिज़ा क्योंकि उसने एक शादी शुदा आदमी के लिए अपना सबकुछ छोड़ दिया। हां वो चालू है क्योंकि उसने समाज से डरे बिना इस सच को स्वीकार किया। वो चालू है क्योंकि अपने धोखेबाज़ पति के पाप पर छुपकर आंसू बहाने के बजाए उसने दुनिया के सामने अपना रोना रोया। वो चालू है कि क्योंकि एक कोने में पड़े रहकर खुद को कोसने के बजाए उसने चांद मोहम्मद से ज़िम्मेदारी लेने को कहा। मैं फिज़ा की समर्थक नहीं हूं। मुझे इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि चांद मोहम्मद उसके पास वापस लौटता है या नहीं। मेरी दिलचस्पी इसमें भी नहीं है कि कौन चांद मोहम्मद की असली पत्नी है। लेकिन मैं एक औरत हूं और मुझे इस बात से फर्क पड़ता है जब फिज़ा के बहाने लोग औरतों पर फिकरे कसते हैं...मुझे फर्क पड़ता है जब नैतिकता के ठेकेदार औरतों को हद में रहने की सलाह देने लगते हैं। मुझे फर्क पड़ता है जब ऑफिस में घटिया मज़ाक के दौर चलते हैं और मेरे बगल में बैठे दो पुरुष सहयोगी एक दूसरे के कानों में कुछ फुसफुसाते हैं और एक घिनौनी सी हंसी हंसते हैं। जी हां मुझे फर्क पड़ता है जब खुद को पढ़े लिखे कहने वाला एक पत्रकार मैंगलोर में हुई लड़कियों की पिटाई को सही ठहराता है। तर्क ये कि जब कोई अपनी सीमा पार करता है तो किसी ना किसी को तो आगे आना ही होगा। तो अब आप बताएंगे हमें कि हमारी सीमा क्या है? आप समझाएंगे हमें कि हमारा चरित्र कैसा होना चाहिए? क्यों भला? आप कौन होते हैं हमारी सीमा तय करने वाले? हमारे चरित्र का ग्राफ बनाने वाले? हमने तो ये हक़ किसी को नहीं दिया। ये सिर्फ और सिर्फ हमारा अधिकार है। और अच्छा यही होगा कि कोई, मतलब कोई भी इस अधिकार में हस्तक्षेप करने की कोशिश ना करे। क्योंकि लड़कियों के ज़रा हाथ-पैर खोलते ही तुम्हारा दम फूलने लगा है। तो सोचो अगर पूरी परवाज़ ले ली तो क्या होगा?

Sunday, January 25, 2009

क्या ये आतंकवाद नहीं?


कुछ ही महीने पहले अपने एक दोस्त से मिली... बहुत दिनों बाद मुलाक़ात हुई थी...और सच कहूं तो उससे मिलकर बहुत अच्छा भी लगा। सिर्फ २ साल में ही उसने काफी तरक्की कर ली थी। मुझसे चार गुना सैलरी थी...और खर्च भी वैसा ही। .उसका नाम नहीं लिखूंगी...इसलिए नहीं क्योंकि मैं उसकी पहचान गुप्त रखना चाहती हूं...बस इसलिए कि क्योंकि आजकल मुझे अपने आसपास हर शख्स में उसका अक्श नज़र आने लगा है। तो जैसा कि आजकल होता है। हफ्ते में पांच दिन वो जमकर काम करता था और दो दिन जमकर मस्ती। लेकिन अंदर कहीं कुछ चुभ भी रहा था। मुझे लगा कि ज़िंदगी में मैं कहीं पीछे छूट गई हूं। एक बार तो ये भी सोचा कि अगर आईटी सेक्टर ज़्वाइन किया होता तो तरक्की के ज़्यादा चांसेज़ थे। लेकिन आज हालात बिल्कुल बदले हुए हैं। उसमें वो ज़िदादिली नज़र ही नहीं आती...बिल्कुल डरा हुआ, सहमा हुआ सा लगता है। जिन मदों में खर्च करने से पहले वो सोचता भी नहीं था आज वही उसे भारी लग रहे हैं। हर हफ़्ते जमने वाली महफिलें सूनी हो गई हैं। मोबाइल का बिल आधा भी नहीं रह गया है और यहां तक कि सिगरेट की लत भी लगता है छूट जाएगी। हर थोड़ी देर के बाद उसके मुंह से निकल ही जाता है कि यार इंडस्ट्री की हालत बहुत ख़राब है। यार आजकल ऑफिस में बहुत टेंशन चल रही है। न जाने कब नौकरी से हाथ धोना पड़ जाए। अपने हमेशा हंसते रहने वाले दोस्त के मुंह से ऐसी बातें सुनकर इस दुनिया पर, इस सिस्टम पर बेहद गुस्सा आता है? क्या दुनिया सिर्फ एक बाज़ार भर है? क्या इंसान सिर्फ एक मशीन भऱ है? जब तक तुम्हारा काम है तब तक इस मशीन को घिसते रहो...और जब काम निकल जाए तो उसे कबाड़ की तरह फेंक दो। आर्थिक मंदी, आर्थिक मंदी सुन-सुन कर कान पक गए हैं। ये आर्थिक मंदी कोई आसमान से तो टपकी नहीं है। दुनिया में पैसा पहले भी उतना ही था जितना कि अब है। कंपनियों के ग़लत फ़ैसले, ग़लत प्रबंधन का खामियाज़ा बेचारे वो लोग क्यों उठाएं जो अपनी दिन रात की मेहनत उस कंपनी को आगे बढ़ाने में लगा रहे हैं। तर्क कहता है कंपनी का बचना ज़्यादा ज़रूरी है तो क्या कंपनी को बचाने के लिए कर्मचारी की बलि लेना ज़रूरी है। अभी तो एक सत्यम का सच सामने आया है। कौन जाने अभी ऐसे कितने सच अंधेरे में दफ़न हैं? तो क्या हर बार जब ऐसा कोई सच सामने आएगा तो मेरा कोई दोस्त अपनी मुस्कान खो देगा? ऐसे तो एक दिन हम सब मुस्कुराना भूल जाएंगे। तब ये कंपनियां अपनी तरक्की का जश्न क्या लाशों के साथ मनाएंगी?

क्यों गर्व करूं?


क्या सर्फ इसलिए क्योंकि मैं इस देश में पैदा हुई हूं? जबकि मैं ये जानती हूं कि यहां पैदा होना या ना होना मेरी मर्ज़ी से तय नहीं हुआ
क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि इस देश की आज़ाद हवा में मैं सांस ले रही हूं? जबकि मैं जानती हूं कि मेरी सोच तक पर पाबंदी लगी है।

क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि यहीं मुझे पेट भरने को अन्न मिल रहा है? जबकि मैं जानती हूं करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं।

क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि इस देश में औरत को देवी की तरह पूजा जाता है? जबकि मैं जानती हूं पत्थर की देवी की तरह औरत को सब कुछ चुपचाप सहन करना पड़ता है।

क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारी संस्कृति सबसे महान है? जबकि मैं जानती हूं कि हमें विरासत में नफ़रत और ज़हर के अलावा कुछ नहीं मिला।

क्यो गर्व करूं मैं इस देश पर?
क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम ऐसा कहते हो?

या इसलिए क्योंकि यहां रहने के लिए यही कहना होगा।

Friday, December 12, 2008

इस कीचड़ में कब तक?


अभी जिस वक्त मैं ये लिखने बैठी हूं रात के कोई साढ़े तीन बज रहे हैं। कायदे से मुझे अभी सो जाना चाहिए। ग्यारह घंटे तक थका देने वाली शिफ्ट के बाद कोई भी यही करेगा। लेकिन मैं जानती हूं मुझे नींद नहीं आएगी। नहीं...मैं किसी प्यार-वार के चक्कर में नहीं पड़ी हूं, मेरे ऊपर घर-परिवार की ज़िम्मेदारी भी नहीं है, मैं किसी कर्ज़ के बोझ से भी नहीं दबी हूं। हां बोझ है, उस जुनून का जो मुझे पत्रकारिता में खींच के लाया, उस वादे का जो मैंने अपने आप से किया था। लेकिन परिस्थितियां हर रोज़ बद से बदतर होती जा रहीं हैं।
बचपन में डार्विन का सिद्धांत पढ़ा था, योग्यतम की उत्तरजीविता....सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट। दुनिया कुछ भी मानती रहे, मैंने हमेशा यही माना कि डार्विन का सिद्धांत जानवरों के लिए है...इंसानों के लिए नहीं। आखिर कैसे एक इंसान अपने सरवाइवल के लिए दूसरे की बलि ले सकता है? बॉयोलॉजी के सर के साथ इसको लेकर काफी बहस भी की, कुछ दलीलें उन्होंने दीं, कुछ मैंने। १२वीं की बोर्ड परीक्षा में मैंने सिर्फ इसलिए डॉर्विन के सिद्धांत की विशेषताएं नहीं लिखी क्योंकि मैं उसके सिद्धांत पर भरोसा नहीं करती थी। सर अभी भी इस बात को लेकर मुझे छेड़ते हैं लेकिन मैं कई महीनों तक इसी गर्व के साथ जीती रही कि मैंने अपनी मर्ज़ी के खिलाफ़ काम नहीं किया। तब मैं स्कूल की एक छात्रा थी, ज़िंदगी के असली सबक अब सीखने को मिल रहे हैं लेकिन अब अपनी बात कहने की वो आज़ादी नहीं है, अब अपनी मर्ज़ी से काम करने की इजाज़त नहीं है। अब मैं पत्रकार जो हूं। आज की पत्रकार। अब मुझे वही करना होगा जो मुझे कहा जाएगा, बिना ना नुकुर किए, बिना बहस किए। क्योंकि सामने मेरे सवालों का जवाब देने के लिए, मेरी आपत्तियों के निदान के लिए मेरे सर नहीं, मेरे बॉस होंगे। चार साल पहले जब हम पत्रकारिता पढ़ रहे थे उन दिनों टीवी के स्क्रीन पर जोश से भरे, आत्म विश्वास से लबरेज़ नज़र आने वाले चेहरे आज न जाने क्यों बहुत धुंधले से लगते हैं। इन साढ़े-तीन चार सालों में मुंह बंद करके अपने आस-पास के लोगों को समझने की कोशिश की लेकिन देखती क्या हूं, यहां या तो कोई कुंठित प्राणी नज़र आता है या आत्म मुग्ध जीव। परेशानी उन कुंठित लोगों से नहीं है जो बेचारे दिन रात अपनी कुर्सी बचाने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। परेशानी उन आत्म मुग्ध लोगों से है जिन्हें हर कामयाबी का सेहरा अपने सिर, और हर नाकामी का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ने की बीमारी है। इनकी दुनिया इन्हीं से शुरू होती है और इन्हीं पर ख़त्म होती है। अब या तो आप इनके पीछे-पीछे दुम हिलाते हुए घूमिए या बेआबरू होकर कोने में बैठिए। इनके अलावा भी कुछ लोग हैं, इन सबके चेहरे एक से हैं, झुंझलाए हुए, गुस्से से भरे, मानो खुद से ही नाराज़ हों। सभी दौड़े चले जा रहे हैं, पता नहीं किस ओर....मंजिल तक पहुंचना इनका लक्ष्य नहीं है, ये तो बस दौड़ रहे हैं, इसलिए क्योंकि सामने वाला दौड़ रहा है। इस उम्मीद में कि कभी तो मौका मिलेगा लंगड़ी फंसाने का। आज भले ही सातवे आसमान पर आपका बसेरा हो लेकिन कब आपसे धरती का टुकड़ा भी छिन जाएगा कोई नहीं बता सकता। मज़े की बात तो ये है कि आपके कमज़ोर पड़ते ही सबसे पहले वो लोग आपका साथ छोड़ते हैं जिन्हें आपने अपना सबसे करीबी माना था। वैसे सच ये भी है कि कमल कीचड़ में ही खिलता है। बस इस उम्मीद में इस पत्रकारिता का दामन थामे हुए हूं कि आज नहीं तो कल कोई कमल खिलेगा ज़रूर। और शायद तब मैं एक बार फिर पूरे जोश के साथ कह सकूंगी कि डार्विन का सिद्धांत इंसानों के लिए नहीं है।

Monday, December 8, 2008

मुझे कैसे रोकोगे?


मैं एक औरत हूं....ये बात मैं कभी भूलती नहीं हूं, और कभी भूलना चाहती भी नहीं हूं। लेकिन फिर भी वो मुझे बार-बार याद दिलाते हैं कि हां तुम एक औरत हो। एक दूसरे दर्जे की प्राणी। वो मेरे प्रवाह को रोकना चाहते हैं, मुझे जंजीरों में कैद करना चाहते हैं। वो डरते हैं कि कहीं मैं उनकी बनाई सीमाओं को तोड़ ना दूं, वो घबराते हैं कि कहीं मैं उनकी पहुंच से दूर उड़ ना जाऊं। वो हर रोज़ मेरे सामने एक दीवार खड़ी करते हैं, लेकिन मैं...मैं एक ही फलांग में उस दीवार को फांद जाती हूं। वो और बड़ी दीवार चुनते हैं, लेकिन मुझे रोक पाना अब उनके बस में नहीं है। वो कहते हैं कि मैं कमज़ोर हूं। मैं इंकार कहां करती हूं? यही तो मेरी जीत है, वो मुझे कमज़ोर समझते हैं फिर भी मुझे बांध नहीं पाते। वो कुढ़ते हैं, झल्लाते हैं और फिर मुझे दबाने की कोशिश करते हैं। जब मैं चुप रहती हूं तो वो मेरी चुप्पी से डरते हैं। और जब में बोलने लगती हूं तो वो कान बंद कर लेते हैं। उनकी इस छटपटाहट को देखकर मैं हंसती हूं, मुंह दबाकर नहीं, खिलखिलाकर हंसती हूं। याद नहीं कि कब उनकी इस झल्लाहट से मुझे प्यार हुआ, शायद तब, जब पहली बार जब मुझे खुली हवा में सांस लेते देखकर उनकी सांसें रुक गई, या तब, जब अपनी बनाई ज़मीन पर मुझे अपनी सफलता के किले बनाते देख उनके पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक रही थी। ये सब कुछ हो रहा था और मैं आगे बढ़ते जा रही थी। मैं बढ़ूंगी, और आगे बढ़ूंगी और तब तक बढ़ते रहूंगी जब तक तुम मुझे आगे बढ़ने से रोकते रहोगे। कहा ना मैं औरत हूं...और इस आगे बढ़ती हुई औरत को रोक पाना अब तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं।

Saturday, December 6, 2008

मीडिया को दोष क्यों?


रात के कोई दस, सवा दस बजे का समय था जब मुंबई के कोलाबा में फायरिंग की ख़बर आई। करीब डेढ़ करोड़ लोगों का शहर है मुंबई, दिन भर में मर्डर, लूट-पाट और गोलीबारी की न जाने कितनी घटनाएं इस शहर में होती हैं। इस ख़बर को ज़्यादा फुटेज नहीं देना चाहिए। यही कहा था मेरे एक सीनियर साथी ने मुझसे। वैसे मेरी राय भी यही थी। लेकिन मुंबई का मामला था इसलिए मैंने ताज़ा ख़बर चलाकर अपनी ड्यूटी पूरी हुई मान ली। सोचा था एक-दो मिनट चला कर ख़बर उतार लेगें। वैसे भी भारत इंग्लैंड को पांचवे वनडे में भी हराने जा रहा था। वो ज़्यादा बड़ी ख़बर है, यही मानकर मैंने उस इन्फॉर्मेशन को भी लिखकर रख लिया। तभी सीएसटी से भी फायरिंग की ख़बर आई। वैसे दूसरे चैनल चार जगहों पर फायरिंग की ख़बर चला रहे थे। तभी मुंबई से अभिषेक का फोन आया और रवीश कुछ परेशान नज़र आने लगे। उन्होंने मुंबई की ख़बर को ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह चलाने को कहा। मैं इस पर कोई आपत्ति करती इससे पहले ही वो फोन थाम कर न्यूज़ रूम से बाहर निकल गए। खैर मुझसे जैसा कहा गया मैने वैसे ही किया। अब तो ख़बरों की बाढ़ सी आने लगी। यहां फायरिंग, वहां धमाका, यहां इतने मरे, वहां उतने घायल। ये क्या हो रहा है? कुछ भी साफ नहीं था। बस ख़बरें आती जा रही थीं और हम उनको ऑन-एयर भेजे जा रहे थे। हर पल एक नई ख़बर आती, और हर नई ख़बर पहले से ज़्यादा गंभीर होती जा रही थी। फिर पता चला कि मुंबई के ही नहीं, देश के ही नहीं बल्कि दुनिया के बेहतरीन होटलों में से एक ताज पर आतंकियों ने कब्ज़ा कर लिया है। कितने आतंकी हैं? उनके पास कितना विस्फोटक है? उनके इरादे क्या हैं? हम एक दूसरे से पूछ रहे थे लेकिन जवाब में बस एक शून्य ही मिलता। हां इन आतंकवादियों का मकसद बिल्कुल साफ था। वो था आतंक फैलाना। सीमा पर लड़ाइयां तो ये देश कई बार देख चुका है, देश में दंगे, धमाके, संसद पर हमला और ऐसी न जाने कितनी ही त्रासदियों से हम गुज़र चुके हैं, लेकिन देश की सीमा के अंदर ऐसे दुस्साहस से हमारा साबका इससे पहले नहीं पड़ा था। न्यूज़ रूम का वातावरण बिल्कुल बदल गया। चारों तरफ गज़ब की उत्तेजना थी, जैसे हम जंग पर जाने की तैयारी कर रहे हों। सारे मतभेद, सारी निराशा, सारी नारज़गी जाने कहां खो गई थी। सभी लोगों में जोश था, एक सहयोग की भावना थी, सिर्फ एक इच्छा कि उनके मोर्चे से कहीं कोई कमी ना रह जाए। खुद मैं, जो कुछ घंटे पहले तक कमज़ोरी की वजह से ठीक से चल नहीं पा रही थी अचानक अपने अंदर अलग ऊर्जा महसूस कर रही थी। मैं ही नहीं सभी लोग अपनी शिफ्ट के बारे में भूल चुके थे। जो लोग घर वापस चले गए थे वो वापस लौट गए थे, जो लोग वापस नहीं लौटे वो फोन करके पूछ रहे थे कि न्यूज़ रूम को उनकी ज़रूरत तो नहीं है? इस बीच एनएसजी और आर्मी को भी ऑपरेशन में शामिल करने का आदेश हो गया था। आतंक के खिलाफ़ जंग जारी थी। और ये सारी ख़बरें दर्शकों तक पहुंचाने की हमारी कोशिश भी। तुरंत कुछ लोग मुंबई रवाना हुए। इधर देश में हाइअलर्ट घोषित हुआ, वहां रिपोर्टर्स को अलर्ट कर दिया गया। क्या भूख, क्या प्यास, क्या घर और क्या परिवार न्यूज़ रूम इन सभी को भूल चुका था। लोग २४- २४ घंटे से ऑफिस में थे और ये भी पता नहीं था कि कितने घंटे और ऑफिस में रहना होगा। लेकिन क्या मजाल कि थकान किसी के आस-पास भी फटकी हो। कई घंटे यहां तक कि कई दिन गुज़र गए। ऑपरेशन ख़त्म हो गया, हमले की जांच शुरू हो गई लेकिन न्यूज़ रूम की गहमागहमी फिर भी जारी रही। यही न्यूज़ रूम का कैरेक्टर है, यही न्यूज़ रूम का मज़ा है। कुछ लोग कहते हैं जब ये हमला हुआ उस वक्त मीडिया सिर्फ सनसनी फैला रहा था। मीडिया को सिर्फ टीआरपी से मतलब है। कुछ ने तो यहां तक कहा कि न्यूज़ चैनल आतंकियों की मदद कर रहे थे। कहा जा रहा है कि ओबेरॉय में छिपे आतंकी टीवी के ज़रिए बाहर की जानकारी हासिल कर रहे थे। कुछ विदेशी नागरिक मीडिया से नाराज़ थे कि मीडिया उनकी लोकेशन टीवी पर दिखा रहा है। हां आलोचना करना हर किसी का हक़ है। और हर आलोचना का उत्तर देने का कोई मतलब भी नहीं। लेकिन फिर भी कहे बिना नहीं रहा जाता कि अगर हम इस हमले की पल-पल की रिपोर्ट ना दिखाते तो क्या करते? आखिर यही तो हमारा काम है। हो सकता है इस दौरान कोई आधी-अधूरी या ग़लत जानकारी न्यूज़ चैनलों ने दिखा दी हो, हो सकता है कुछ ऐसी सूचनाएं ऑन-एयर कर दी हों जिन्हें देशहित में छिपाया जा सकता था। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि ऐसी सिचुएशन में सबकुछ लाइव होता है। आपके पास मौका ही नहीं होता कुछ एडिट करने का, एनालिसिस करने का। जो जैसा है, वैसा ही दर्शकों के सामने रखना पड़ता है। इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, ना ही शर्मिंदा होने की कोई बात है। इसलिए मेरी गुज़ारिश है कृपया मीडिया को दोष ना दें, उसे उसका काम करने दें।

Monday, November 24, 2008

मीडिया बनाम जनस्वास्थ्य


मीडिया बनाम जनस्वास्थ्य
उमेश पंत

स्वास्थ्य एक ऐसा मुद्दा है जो भारतीय मीडिया में अछूत सी हैसियत रखता है इसीलिये एनडीटीवी इन्डिया पर स्वास्थ्य पर फीचर देखकर एकबारगी हैरानी हुई कि यह कैसे हो गया? विशेषकर हिन्दी मीडिया में यह विषय बेहद उपेक्षित है। देश में एक ओर पंचसितारा अस्पतालों के चलन ने जोर पकड़ा है। हेल्थ टूरिजम के बहाने विदेशी पर्यटक बेहतर स्वास्थ्य की उम्मीद में यहां आते हैं और हमारा देश उनकी उम्मीदों पर खरा भी उतरता है। उन्हें उनके मन माफिक माहौल और सुविधाएं मुहैय्या कराई जाती हैं और दूसरी ओर जो अपने देश के लोगों के स्वास्थ्य का आलम है वो एनडीटीवी की इस रिपोर्ट में प्ूारे दर्द और नंगी सच्चाई के रुप में बंया हो जाता है। देश की राजधनी के प््रामुख सरकारी अस्पताल लोकनायक जय प्रकाश अस्पताल में जनस्वास्थ्य की धज्जियां उड़ते देख जो दर्द होता है उस दर्द का इलाज इस अस्पताल में तो क्या प्ूारी व्यवस्था में फिलवक्त नहीं दिखाई देता। रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में जहां बच्चों की मृत्यु दर 3 दशमलव 3 प््रतिशत वहीं इस अस्पताल में आने वाले बच्चों की मृत्युदर 33 प््रातिशत के आसपास है। गन्दगी से सने अस्पताल के जो दृश्य फीचर में दिखाये गये उन्हें देख नर्क की कल्पना को साक्षात किया जा सकता है। लेकिन इस नर्क की यह हकीकत मीडिया में कभी जगह नहीं बना पाती क्योंकि उपेक्षा का दंश झेलता न वह निम्नवर्गीय आदमी स्क्रीन पर अच्छा लगता है न ही वह अस्पताल जिसे बनाया तो उसे स्वस्थ्य रखने के लिए है, लेकिन जहां रहकर सेहत का सुध्र पाना कतई असम्भव सा है।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 80 प््रतिशत प््रााथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में एक भी चिकित्सक नहीं है। ऐसे में वहां झोलाछाप डाक्टर अब भी व्यवस्था का विकल्प बने हुए हैं। दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में ओझाओं और भोपाओं के टोटकों को स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए अपनाने के सिवाय लोगों के पास कोई चारा है। आप दूर बैठे चाहे इसे अन्ध्विश्वास कहें लेकिन यही उनकी मजबूरी है।
देश में 8 प्रतिशत स्वास्थ्य केन्द्रों में एक भी डाक्टर नहीं है। जबकि 39 प्रतिशत अस्पताल बिना लैब टैक्नीशियन और 17 प्रतिशत अस्पताल बिना फार्मासिस्ट के चल रहे हैं। यह तथ्य हाल ही में जारी की गई राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की रिपोर्ट से उजागर हुए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में 6 लाख पचास हजार डाक्टर काम कर रहे हैं। भारत में औसतन 1700 लोगों पर एक डाक्टर उपलब्ध है जबकि अमेरिका में 400 लोगों पर 1 डाक्टर उपलब्ध है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित पदों में से 59 दश्मलव 4 प्रतिशत सर्जन, 45 प्रतियशत गाइनोकोलोजिस्ट और 61 दशमलव 1 प्रतिशत फिजिसिायनों के पद रिक्त पड़े हैं। शहरी गरीबों में 3 साल से कम आयु के लगभग 57 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। देश में तकरीबन 6 लाख से ज्यादा लोग हर साल टी बी की चपेट में आकर मर जाते हैं। निमोनिया हर साल 4 लाख लोगों को लील जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 2005 में 1 लाख 7 हजार माताओं की मृत्यु हो गई। नेश्नल फैमिली हैल्थ सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की हर दूसरी महिला एनीमिया की शिकार है।
स्वास्थ्य के इन बिगड़े हालातों की वजह विभिन्न ज्ञस्वास्थ्य योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार है। विश्व बैंक ने खुलासा किया है कि 1993 से 2003 तक भारत में लागू की गई विभिन्न स्वास्थ्य परियोजनाओं में 2500 करोड़ रूपये का घोटाला किया गया। भारत सरकार ने इस आरोप को स्वीकार करते हुए कहा है कि परियोजनाओं के डिजाइन, निरीक्षण और कार्यान्वयन में खामियां रही हैं।
कहने को ये महज आंकड़े हैं, आंकड़े जो पूरी तरह चर्मराई हुई देश की स्वास्थ्य सुविधओं को संज्ञान में लाने के लिए समय समय पर रिपोर्ट की शक्ल में आते हैं। ये आंकड़े कई गैर सरकारी संगठनों को अस्तित्व में बनाये रखते हैं, कई शोध्कर्ताओं को पालते हैं। लेकिन इन आंकड़ों की शक्ल कभी इतनी भयावह नहीं लगती। इन आंकड़ों पर कभी बहस नहीं होती। क्योंकि आज का दौर मीडिया एडवोकेसी का है। मीडिया जिस मुद्दे को उछाल देगा उस पर क्रिया प्रतिक्रिया और तमाम हलचलें होंगी। लेकिन न जाने क्यों यह विडम्बनाबोध हमारे मीडिया को अब तक नहीं हो पाया है कि लचर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की सूली में चढ़ाये जा रहे आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए मीडिया में जगह नहीं है। यह तय है कि जब तक मीडिया स्वास्थ्य सम्बन्ध्ी अनियमितताओं को बढ़चढ़कर उजागर नहीं करेगा, उन्हें चुनावी मुददा बनने को मजबूर नही करेगा, तब तक ना ही नेता न सरकार स्वास्थ्य सुविधओं में सुधर के लिये सक्रिय होंगे।
स्वास्थ्य के मसले पर मीडिया की नीतियों में भी खामियां हैं। मीडिया में तथ्यों के मैनिपुलेशन की प््रावृत्ति बढ़ी है। उसपर बड़ी फार्मास्यूटिकल कम्पनियों का दबाव साफ नजर आता है। एक सेमीनार में डा ए के अरूण ने बीमारियों के उन्मूलन कार्यक्रमों के नियंत्राण कार्यक्रमों में बदल जाने को चिन्ताजनक बताया। उन्होंने कहा कि मीडिया को जनता तक सही तथ्य पहुंचाने चाहिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मैंनिंगो कोक्सीमिया रोग दिल्ली में आया भी नहीं था और मीडिया में फैलाए गये भ्रम के कारण इस रोग के 50 करोड़ वैक्सीन बिक गये। मीडिया के ऐसे प्रचारों से जनता के पैसे भी व्यय होते हैं और उनमें अनावश्यक भय भी पैदा होता है।
आज स्वास्थ्य मसलों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्यों सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बद से बदतर हो रही है? क्यों ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे अति प्रचारित सरकारी प्रयासों के सकारात्मक परिणाम धरातल पर नहीं दिखाई देते? इन परियोजनाओं के नाम पर पानी के भाव बहाया गया पैसा आंखिर कहां पचा लिया गया? और लाख टके का सवाल यह कि मीडिया में अस्पतालों के बड़े और लम्बे विज्ञापनों तो हैं लेकिन जनस्वास्थ्य के मौजूदा परिदृश्य का असल चित्राण क्यों शिरे से गायब है। कम से कम मीडिया को अपनी जवाबदेही तय करनी चाहिये। एनडीटीवी से प्रेरित होकर यदि यह मुहिम अन्य चैनलों में भी दिखाई दे पाती है तो शायद परिदृश्य में कोई बदलाव हो पाये।

Monday, November 3, 2008

सलाम kumble


कोटला टेस्ट का आखिरी दिन....दोपहर के बाद का समय...मैच में कोई रोमांच बचा नहीं था...सब जानते थे कि टेस्ट ड्रा हो रहा है...इस टेस्ट में ऐसा कोई रिकॉर्ड भी नहीं बना कि लोग इसे याद रख सकें। फिर भी ये टेस्ट खास बन गया। अनिल कुंबले ने इसी मैदान को चुना क्रिकेट से अपनी विदाई के लिए। अब साबित करने के लिए कुछ बचा भी तो नहीं था। कोटला की पिच सही मायने में कुंबले की है। सात फरवरी १९९९ का वो दिन क्या कोई क्रिकेट प्रेमी भूल सकता है? यही तो वो मैदान था जहां कुंबले ने पाकिस्तान के सभी १० खिलाड़ियों को अपनी फिरकी के जाल में फंसाया था। लोगों ने कहा कि ये एक चमत्कार है। लेकिन वो चमत्कार नहीं था। वो इस सीधे, सज्जन और सौम्य खिलाड़ी की बरसों की तपस्या का नतीजा था। उसकी दिन रात की मेहनत का नतीजा था। यही वो मैदान था जहां पहली बार कुंबले सचिन, द्रविड़ औऱ सौरव गांगुली को पीछे छोड़ कर एक स्टार बने। कुंबले के इस फैसले के पीछे वजह जो भी हो लेकिन सच यही है कि उन्हें कभी भी वो सम्मान नहीं मिला जिसके वो हक़दार थे। एक आद मौकों को छोड़ दें तो कुंबले कभी स्टार नहीं बन पाए। दरअसल स्टार बनना वो सीख ही नहीं पाए। बेवजह के बयान देना, मैदान के बीच में डांस करना, नए-नए हेयर स्टाइल बनाना, विपक्षी खिलाड़ियों से उलझना, शर्ट उतारकर हवा में लहराना...अगर कुंबले ये सब कर पाते तो आज वो भी स्टार होते। लेकिन कुंबले ने तो सिर्फ खेलना सीखा था। क्रिकेट उनके लिए शौक या पैसा कमाने का ज़रिया नहीं बल्कि उनके जीने का ज़रिया है। वरना क्या पड़ी थी उन्हें वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ टूटे हुए जबड़े के साथ मैदान में उतरने की। अंगुली में लगे ११ टांके क्यों नहीं रोक पाए कुंबले के कदम। सिर्फ इसलिए क्योंकि वो योद्धा है। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने हारना नहीं सीखा है। वो जानता है कैमरे के फ्लैश कभी उसके लिए नहीं चमकेंगे, रिपोर्टर कभी उनकी बाइट के लिए नहीं भागगें। लेकिन उसे ये भी पता है कि वो नींव है...इमारत कितनी भी बुलंद क्यों ना हों, कितनी भी खूबसूरत क्यों ना हो नींव अगर ज़रा सा भी हिल जाए तो उसे ज़मीदोज़ होने में देर नहीं लगती। कभी अनिल कुंबले ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि क्रिकेट बल्लेबाज़ों का खेल है। एक बल्लेबाज़ को एक छक्के से उतनी तालियां मिल जाती हैं जितनी एक गेंदबाज़ को विकेट लेने पर भी नहीं मिलती। मीडिया में छाई एक दिन की सुर्खियां भारतीय क्रिकेट के लिए कुंबले के योगदान को नहीं बता सकती, कुंबले के खाते में दर्ज ६१९ विकेट उसके जीवट को नहीं समझा सकते। अब अनिल कुंबले मैदान पर क्रिकेट खेलते नज़र नहीं आएंगे। युवा ब्रिगड का सपना देखने वाले कुंबले की विदाई से खुश हैं लेकिन कुंबले की खाली जगह कौन भरेगा ये जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि कुंबले के संन्यास की वकालत करने वाले भी जानते हैं कि कुंबले की जगह कोई भर नहीं सकता। कंचन

Friday, October 26, 2007

अपनी दिशा

दिशा...पूरब,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण। यही या और भी । दस दिशाएं... क्या केवल दस...दहाई के छूते ही समाप्त। इससे तो कई बड़ा है दिशाऒं का दायरा। या कहें कि दिशाऒं का तो कोई दायरा ही नहीं है। जब जहां जिस ऒर खड़े हों मुंह बायें दिशा बन जाती है। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि आपकी अपनी भी कोई दिशा हो सकती है। दसों दिशाऒं के प्रतीक दस घोड़ों के रथ पर सवार सूर्य की तरह आप भी अपनी दिशाऒं के स्वामी हो सकते हैं। क्या आपने कभी उस स्वामित्व को महसूस नहीं किया है।
चिट्ठों की यह दुनिया भी तो अपनी अपनी दिशा की द्योतक है। आप अपने चिट्ठे के स्वामी हैं। जो भी आपके चिट्ठे पर नज़र डालेगा वह कुछ देर के लिए ही सही उस दिशा में सोचने लगेगा जो आपने उसे दिखाई है। यह आपकी अपनी नितान्त मौलिक दिशा का प्रभाव है।

हम चाहते हैं कि आप अपनी दिशा से जुड़ें। इसे अपनी दिशा ही समझें। अपने विचार व्यक्त करें। बहस का माहौल तैंयार करें। चिट्ठों का यह संसार एक नया वैचारिक आन्दोलन खड़ा कर सकता है।कुछ और न सही हमें सोचने समझने के लिए प्रेरित कर सकता है। हमें अपनी दिशा अपना रास्ता खोजने में मदद कर सकता है। यह हमारी अपनी दिशा होगी।हमारा अपना अन्दाज़। ऒर वैसे भी-
क्यों अपनी तरह जीने का अन्दाज़ छोड़ दें
और है ही क्या अपना इस अन्दाज़ के सिवा।

Tuesday, October 23, 2007

पहाड़ की बात


पहाड़। क्या लगता है ये सुनकर। बहुधा यही कि हरी भरी वादियों के बीच उभरे शान्त चट्टानी इलाके। घने जंगल। सुन्दर नदियां। झरने ताल गाड़।
इन पहाड़ों के बीच कई संस्कृतियां पनपी हैं। विकसित हुई हैं। कुछ लुप्त हो गई हैं। कुछ बदल गई हैं। शेष बदल रही हैं। धीरे धीरे। समय के साथ। लेकिन जिस तरह इन पहाड़ों के बीच रहने वाले लोगों के नैसर्गिक सुख अपने हैं उसके बरक्स तमाम दुख भी अपने हैं। दुख जो बांटे तो जा सकते हैं। पर बांटे नहीं जाते। खैर पहाड़ के लोग नियति की तरह सुख दुख के इन सोपानों पर चढ़ते उतरते शान्त माहौल में अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं।
अपने चिट्ठे के इस पहाड़ी इलाके में हम कोशिश करेंगे कि आपसे पहाड़ के पहाड़ियों के सुख दुख बांटें। जिस भी हद तक पहाड़ को जानने समझने जीने का मौका मिला है उसके अनुभव बयां करना भी पहाड़ को समझने का अच्छा ज़रिया हो सकता है।

आर्तनादः पांच दिन पिचहत्तर किलोमीटर




गंगोलीहाट में अभिलाषा एक प्रयास नाम से छात्रों का एक अनौपचारिक संगठन है जिसे रोहित भाई के साथ कुछ सालों पहले हम लोगों ने क्षेत्र के कुछ युवा साथियों की मदद से प्रारम्भ किया। हमें सूझी कि क्यों न‌ क्षेत्र के सबसे बीहड़ बेल और भैरंग पट्टी के इलाके की खाक छानी जाय। इस तरह तय हुआ पांच दिनों के गांव चलो अभियान का कार्यक्रम। सात आठ लोगों का हमारा दल गाते बजाते गांव गांव घूमा। पांच दिनों में पिचहत्तर किलोमीटर की पहाड़ी यात्रा थी यह। चट्टानों पर चढ़ती धूप ढ़लती शाम में चढ़ना उतरना। हमें मालूम हुआ कि यूं ही इस क्षेत्र को गंगोलीहाट का शोक नहीं कहा जाता।

बेल और भैरंग पट्टी इन दो पट्टियों में लगभग पचास गांव हैं जहां आज भी आवश्कता के हिसाब से न बिजली है न पानी ही। और सड़क तो आज भी एक सपना ही है। एक ग्राम प्रधान ने हमें बताया कि उन्होंने सड़क के लिए कई बार आन्दोलन किये। तत्कालीन विधायक नारायण राम आर्य के कार्यकाल में धोखे से आन्दोलन स्थगित करवा दिया गया। वादे कई बार हुए लेकिन उनका कोई अंश तक पूरा नहीं हुआ। नेताऒं का व्यवहार ग्रामीणों के लिए यह है कि सांसद बची सिंह रावत साल में एक बार चुनावों के दौर में इन क्षेत्रौं का हाल जानने पहुंचे। और फिर पांच साल के अपने कार्यकाल में कभी उनके दर्शन ग्रामीणों को नहीं हुए। प्रशासनिक अधिकारियों के लिए तो ये ग्रामीण अछूत की औकात रखते हैं। एक बुजुर्ग लगभग रोआंसे होकर हम से बोले कि मुझसे एक जनता दरबार के दौरान तत्कालीन उपजिलाधिकारी ने यह कहा कि पहले बोलना सीखकर आऒ फिर अपनी समस्या बताना।
सरकार दिन-ब-दिन कोई न कोई स्कूल खोलती है । स्कूल तो खुल जाते हैं लेकिन वहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं कराये जाते। हमने एक दूरस्थ गांव चौरपाल में अपनी आंखों से देखा कि कि शिक्षक स्कूल से गायब थे। बच्चे आगन में बैठे शोर कर रहे थे। काफी ना नुकुर करने के बाद बच्चों ने बताया कि कि स्कूल में कभी घंटी तक नहीं बजती। मौजूदा समर में चौरपाल में इन्टर कौलेज है। जहां कहने को तो साइंस माध्यम के तौर पर है लेकिन वहां ना गणित के टीचर हैं ना ही बायोलौजी के। कोई शिक्षक इन बीहड़ गांवों में जाकर पढ़ाना पसन्द नहीं करता।
इन गांवों में महिलाऒं की जो स्थिति है वह महिला सशक्तिकरण के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। रिटायर फौजियों से प्राप्त की हुई कोटे की मुफ्त शराब पीकर इन महिलाऒं के पति रोज रात इन्हैं पीटते हैं। दिनभर काम के बोझ से थकी ये औरतें नियति मानकर इस अत्याचार को सह लेती हैं। महिला हिंसा विरोघी कोई भी कानून इनकी पहुंच से बहुत दूर है। कुछ महिलाओं ने जब अपनी दास्तान बयां की तो हमने उन्हें दसाईथल ( पिथौरागढ़ ज़िले का एक छोटा सा कस्बा) में महिलाओं द्वारा किये गए एक प्रयोग की जाकारी दी। इन महिलाओं ने अपने शराबी पतियों के खिलाफ़ बिच्छू घास की मदद से मोर्चा संभाला। जैसे ही किसी महिला का पति शराब पीकर घर में घुसता वो दूसरी महिलाओं को खबर कर देती और सभी महिलाएं बिच्छूघास लेकर उस शराबी पर पिल पड़तीं। ये प्रयोग शराब के विरुद्ध काफई हद तक सफल हुआ। पूरे गंगावली क्षेत्र में शराब ने महिलाओं को बुरी तरह परेशान किया है। २००६ में एक शराब विरोधी आंदोलन गंगोलीहाट में हुआ। जिसके बाद इलाके से शराब भट्टी तो हटा दी गई पर शराब की तस्करी अब भी बदस्तूर जारी है।

पानी की समस्या से बेल पट्टी और भैंरंग पट्टी का पूरा इलाका त्रस्त है। विडम्बना ये है कि सरयू और रामगंगा का पानी जिसे लगभग पचास किलोमीटर दूर ज़िला मुख्यालय पिथौरागढ़ को पाइपलाइनों द्वारा भेजा जाता है वो पानी दो से १० किलोमीटर के दूर के इलाकों में फैले इन गांवों तक नहीं पहुचाया जा सका है। ये ग्रामीण कई कोस की खड़ी चढ़ाई पार कर पीने का पानी लाने के लिए मजबूर हैं। तहसील मुख्यालय तक में पीने के पानी के लाले हैं। पिछले बीस सालों से प्रस्तावित लिफ्ट योजना अधर में है। अब जिस सालीखेत स्रोत से प्रस्तावित लिफ्ट योजना पर काम शुरू होने जा रहा है उसमें इतना पानी नहीं बचा है कि वो इन लगभग अस्सी गांवों की प्यास बुझा सके। लेकिन ना सरकार, ना जनप्रतिनिधि किसी का ध्यान इस ओर नहीं है।
इस यात्रा के दौरान जो कुछ भी हमने देखा या जो कुछ महसूस किया ऊपरी तौर पर देखने पर हमे वो हैरतअंगेज़ लग सकता है लेकिन सच मानिये हकीकत यही है......

Tuesday, October 9, 2007

कमाल विचारों की उड़ान का


विग्यान
एक बंदर कूदता है इस डाल से उस डाल।
देखते हैं उसे दो लोग।
पहला खिलखिला उठता है उसे देख यूं ही।
दूसरा उसे देखता है गौर से
और कहता है गति हुई।
बस इसी सोच का अदना सा अन्तर विग्यान है।


ब्लैक होल- अंतरिक्ष के गर्भ में छिपा रहस्य

बह्मांड के अनंत विस्तार में ढेरों रहस्य और अदभुत करिश्मे छिपे हुए हैं। ब्लैक होल भी अंतरिक्ष का ऐसा ही एक रहस्य है। इस अदभुत आकाशीय रचना को समझाने के लिए साइंटिस्टों ने कई सिद्यांत दिए, कई तर्क पेश किए। लेकिन क्या ब्लैक होल को समझना इतना आसान है? सैद्यांतिक तौर पर देखें तो हां लेकिन जब बात प्रायोगिक तौर पर इसे सिद्ध करने की आती है। तो इसे सिद्ध कर पाना संभव ही नहीं है। क्योंकि दुनिया की कोई भी प्रयोगशाला ब्लैक होल के अस्तित्व को साबित नहीं कर सकती। लेकिन हकीकत में ब्लैकहोल आखिर हैं क्या?
आम भाषा में कहें तो ब्लैक होल एक ऐसा तारा है जिसका गुरुत्वीय बल असीमित है। इतना ज्यादा कि प्रकाश तक इसकी गुरुत्वीय सीमा से बाहर नहीं निकल सकता। और ब्लैक होल का बनना उतना ही प्राकृतिक है जितना सूर्य का चमकना या ग्रहों का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना। ब्लैक होल वास्तव में एक तारा है। हमारे सूर्य से लाखों गुना बड़े आकार का तारा। तारों में हर वक्त नाभिकीय संलयन की प्रक्रिया होती रहती है। और हर बार इस प्रकिया के साथ तारे की ऊर्जा भी घटती जाती है। करोड़ों सालों तक इस प्रकिया से गुजरने के बाद एक समय ऐसा आता है जब तारे के पास इतनी भी ऊर्जा नहीं होती कि वो अपने आकार तक को बनाए रख सके। और ये तारे तेज़ी से सिकुड़ने लगते हैं। ब्लैक होल बन रहे तारे का आकार जैसे-जैसे छोटा होता जाता है, इसका घनत्व बढ़ता है और उसी अनुपात में तारे की गुरुत्वीय बल (ग्रेविटेशनल फोर्स) भी बढ़ता जाता है। ब्लैक होल मे बदल चुके तारे का गुरुत्वीय बल इतना ज़्यादा होता है कि कोई भी चीज़ इसकी गुरुत्वीय सीमा को पार करके बाहर नहीं आ सकती। कोई ऊर्जा भी नहीं। ब्लैक होल अपनी सीमा में आने वाली हर चीज़ को निगल लेता है।
लेकिन ये होता कैसे है? इस बात का जवाब साइंस के बेहद आसान सिद्यांतों में छिपा हुआ है। जब कभी हम आसमान की ओर कोई चीज़ उछालते हैं तो वो थोड़ी ऊपर तक जाने के बाद वापस धरती की ओर आने लगती है। क्योंकि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल उसे अपनी ओर खींच लेता है। लेकिन अगर किसी चीज़ को बहुत तेज़ गति के साथ आसमान की ओर उछाला जाए तो वो गुरुत्वाकर्षण की सीमा से निकलकर अंतरिक्ष की ओर बढ़ती रहेगी। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा से बाहर निकलने के लिए ज़रूरी इस वेग को पलायन वेग कहते हैं। हर ग्रह, उपग्रह और आकाशीय पिंड का पलायन वेग अलग-अलग होता है। ये पलायन वेग उस पिंड के आकार, घनत्व या यूं कहें कि गुरुत्वीय बल पर निर्भर करता है। जिस पिंड का गुरुत्वीय बल जितना ज़्यादा होगा, उसका पलायन वेग भी उतना ही बढ़ जाएगा। अगर पृथ्वी की बात करें तो इसका पलायन वेग ११.२ किलोमीटर प्रति सैकिंड है। यानी जो पृथ्वी से जो भी रॉकेट या अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष की ओर भेजे जाते हैं उनका वेग ११.२ किलोमीटर प्रति सैकिंड से ज़्यादा ही होता है। क्योंकि इससे कम वेग के साथ ये पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर नहीं निकल सकते। इसी तरह चंद्रमा का पलायन वेग सिर्फ २.४ किलोमीटर प्रति सैकिंड है। क्योंकि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी से करीब ६ गुना कम है।
अब अगर हम ऐसे किसी पिंड की कल्पना करें जिसका पलायन वेग प्रकाश की गति ( प्रकाश से तेज़ गति किसी चीज़ की नहीं होती) ज़्यादा है तो क्या होगा? ज़ाहिर है प्रकाश भी इस पिंड के गुरुत्वीय आकर्षण से बाहर नहीं निकल पाएगा। बस यही पिंड ब्लैक होल है।
ब्लैक होल जैसी किसी चीज़ का विचार एस्ट्रोलॉज़र्स के दिमाग में १७वीं शताब्दी में ही आ गया था। लेकिन १९३० में तीन साइंटिस्टों ने इसके बारे में गंभीरता से खोज करनी शुरू की। ओपनमेर, वोल्कॉफ और सिंडर ने अपनी रिसर्च के बाद बताया कि जब किसी बड़े तारे की ऊर्जा खत्म होने लगती है तो ये अपने गुरुत्वीय बल से खुद को भी नहीं बचा पाता। औऱ नष्ट होकर ब्लैक होल में बदल जाता है। हांलाकि इसे ब्लैक होल नाम इन तीनों ने नहीं दिया। इस तारे को ब्लैक होल का नाम जॉन व्हीलर ने दिया और ये नाम इस तारे के लिए बिल्कुल उपयुक्त भी है। क्योंकि ब्लैक होल को ना तो कोई देख पाया है और ना ही कभी कोई देख पाएगा। क्योंकि रोशनी की किरण तक को इसका तीव्र गुरुत्वीय बल अपने अंदर खींच लेता है। लेकिन ब्लैक होल बन जाना भी किसी तारे का अंत नहीं है। जाने माने साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग ने १९७० में एक सिद्यांत के ज़रिये ब्लैकहोल को समझाने की कोशिश की। हॉकिंग का कहना है कि क्वांटम-मैकेनिक्स के मुताबिक ब्लैक होल लगातार विकिरण(रेडिएशन) छोड़ते रहते हैं। जिसकी वजह से इनका द्रव्यमान घटता रहता है। और ये सिकुड़ते जाते हैं। और आखिर कार ये तारा पूरी तरह से नष्ट हो जाता है।

क्या होगा अगर कोई ब्लैक होल में गिर जाए।

ब्लैक होल में गिरने का मतलब है, हमेशा-हमेशा के लिए अंतहीन अंधेरे में खो जाना। एक बार अगर कोई चीज़ ब्लैक होल में गिर जाए तो दुनियां की कोई भी ताकत उसे वापस नहीं खींच सकती। जैसे ही कोई चीज़ ब्लैक होल मे गिरती है तो ब्लैक होल का केंद्र उसे तेज़ी से अपनी ओर खींचने लगता है। इतनी तेज़ी से कि ब्लैक होल की परिधि से इसके केंद्र तक की सैकड़ों- हज़ारों किलोमीटर की दूरी को तय करने में इस चीज़ को महज कुछ सैकिंड ही लगते हैं। इसे समझने के लिए बस यही उदाहरण काफी होगा कि अगर सूर्य से १० लाख गुना ज़्यादा द्रव्यमान वाले वाले किसी ब्लैक होल में कोई चीज़ गिरनी शुरू होगी तो ब्लैक होल का केंद्र इसे तेज़ी से अपनी ओर खींचेगा। और अगर इस वस्तु की शुरुआती स्थिति ब्लैक होल की तृज्या से १० गुना दूरी पर हो तो इसे ब्लैक होल के हॉरिजन तक पहुंचने में लगेंगे आठ मिनट और इसके बाद इसके टुकड़े-टुकडे होकर बिखरने में लगेंगे सिर्फ ७ सैकिंड। और अगर कोई इंसान ६० लाख किलोमीटर दूर किसी ब्लैक होल में गिरने लगे तो सिर्फ आठ मिनट और सात सैंकिंड में उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। और ब्लैक होल का द्रव्यमान जितना कम होगा , मौत का समय भी उतना ही कम होता जाएगा।

क्या सूर्य भी ब्लैक होल में बदल जाएगा?

ये सच है कि कई सितारों की ज़िंदगी ब्लैक होल के रूप में ख़त्म होती है। लेकिन सूर्य के ब्लैक होल में बदलने की संभावना नहीं के बराबर है। क्योंकि ब्लैक होल में बदलने के लिए तारे का द्रव्यमान बहुत ज़्यादा होना चाहिए। हमारे सूर्य से लाखों गुना ज़्यादा। सूर्य का द्रव्यमान ब्लैकहोल में बदलने के लिए काफी नहीं है। एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिज़िक्स के जानकार मानते हैं कि अगले ५ करोड़ सालों तक सूर्य को कुछ नहीं होने वाला। लेकिन इसके बाद सूर्य की ऊर्जा कम होने लगेगी और ये बुध और शुक्र को निगल जाएगा। इससे सूर्य का आकार बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर धरती का तापमान कई गुना बढ़ जाएगा। महासागर उबलने लगेंगे और जीना मुश्किल हो जाएगा। और यही होगी पृथ्वी पर जीवन के अंत की शुरूआत। पृथ्वी पर उथल-पुथल मचाने के बाद सूर्य एक सफेद बौने तारे(व्हाइट ड्वॉर्फ़ स्टार) में बदल जाएगा। और अगर किसी वजह से सूर्य ब्लैक होल में बदल भी गया तो ये इतना मामूली ब्लैक होल होगा कि ब्रह्मांड में इसके होने या ना होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। इस ब्लैक होल की सीमा सिर्फ़ तीन किलोमीटर होगी। यानी पृथ्वी कम से कम इस ब्लैक होल में गिर कर तो खत्म नहीं होगी। लेकिन इससे कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि सूर्य के बिना तो पृथ्वी वैसे ही ख़त्म हो चुकी होगा। लेकिन ये सब होगा करीब आठ करोड़ साल के बाद...क्या पता तब तक इंसान पृथ्वी के विकल्प के रूप में कोई और ग्रह ही खोज ले।

Saturday, October 6, 2007

फ़लक

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पुरानी डायरी
एक दौर था जब डायरी लिखने का शौक परवान चढ़ा था। वो कोई रोज की दिनचर्या में से कुछ खास रात सोने से पहले लिखने जैसा नही था। बल्कि एक स्लैम बुक की तरह दोस्तों को अपनी डायरी दे देना। और उसमें उन लोगों का प्रोफाइल (मसलन जन्म दिन पसंद नापसंद) और कुछ शायरियां पाट दी जाती थी। लेकिन उनमें से कुछ लोगों ने लीक से हटकर कुछ आलेख लिखे। ऎसे आलेख जो जितने बार पढ़ जाएं प्रेरणा ही देते हैं।
पुरानी डायरी में सहेजे ऎसे कुछ आलेखों को यहां सहेजा है।
पुरानी डायरी के कुछ अंश-----

उमेश के लिए
२१ मई २००४ कमलेश उप्रेती
यूं तो कोई बन्धन नहीं कि ये लिखना है वो लिखना है। इसलिये खुलकर काफी चीज़ें कागज़ पर उड़ेली जा सकती हैं। डायरी लिखना एकमात्र शौक या शगल नहीं होता है। ये एक दस्तावेज भी होता है अपने वक्त का। इसमें कुछ भी अगर हम लेखते हैं वो उथला नहीं होना चाहिये।समय रहते अगर हम अपनी पुरी आदतें शिद्दत से बयान करते हैं तो हमारे भविष्य मे ये बातें जब इतिहास हो जायेंगी तो उसमें विरोधाभास नहीं होंगे। उस पर सम्भावना नहीं रहेंगी कि मिथकों का आरोपण किया जाय। किसी वक्त में अगर हम चाहते हैं कि सच्चाई लिखें तो हमें अपने आसपास की परिस्थितियां राजनैतिक सामाजिक सब पर एक सही और पैनी नज़र रखनी होगी।हम जब पढ़ते हैं सुनते हैं या किसी बाह्य माध्यम से ग्रहण करते हैं उस पर हमारी द्रिष्टि आलोचनात्मक होनी चाहिए। यही तरीका है जिससे हम किसी व्यक्ति व्यव्स्था या घटना को सही सही पहचान सकते हैं।

२७ दिसम्बर २००४ रोहित
यह डायरी लिखने से पहले मैं आगे के पन्नों में कमलेश दा का लेख पढ़ चुका हूं। सहमत हूं कि डायरी एक ठोस दस्तावेज़ बन सकती है। इसे व्यक्तिगत बनाने के नाम पर अति संकुचित कर देना ग़लत होगा। डायरी एक माधयम हो सकता है एक दूसरे को जानने का। और एक रचनात्मक बहस का माहौल तैयार किया जा सकता है। मगर ज़रूरत है कि डायरी स्लैम बुक इस तरह की चीज़ों को रूख देने का। क्योंकि जहां शून्य होता है वहीं शुरूआत होती है। प्रायोजन की दिशा में भटकाव भी होता है। ज़रूरत है एक सही दिशा देने की। एक पहल की।
हर हमेशा तर्क देने में विकल्प के प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता होती है । यदि मैं विकल्प नहीं देता हू़ तो मेरा तर्क अपने धरातल पर ठोस नहीं है। लेकिन फिर भी मैं सोचता हूं कि डायरी में जो लेखन है उसे कहीं न कहीं अति संकुचित ही कर दिया जाता है। हो सकता है मैं ग़लत हूं। अग्रलिखित मेरा लेख मेरे इस तर्क पर विकल्प का प्रस्तुतीकरण भी कर रहा है। क्योंकि डायरी लेखन भी एक रचनात्मक प्रयास ही है।

जामिया रक्से कुनाहो के तेरी ईद है आज

जामिया मिल्लिया में इन पांच दिनों बड़ी रौनक रही। आज मेला खतम हो गया तो बड़ा तो बड़ा सूनापन महसूस हो रहा है। भीड़ अक्सर परेशान करती है पर कभी कभी खुशनुमा भी मालूम होती है। खासकर इस भीड़ का हिस्सा जब युवा चेहरे हों। हंसते चहकते। २८ अक्टूबर से ३ नवम्बर जामिया में तालिमी मेला अपनी रौनक बिखेरता रहा। कभी वादविवाद कभी गाना बजाना कभी लैक्चर तो कभी थियेटर। अलग अलग तरह के ७० कार्यक्रम । किताबों खाने पीने के सामानों और जामिया के अलग अलग विभागों के स्टाल। हज़ारों की भीड़। संगीत कार्यक्रमों में की गई हूटिंग और मस्ती भरे ये पांच दिन।
जामिया केवल एक यूनिवर्सिटी का नाम नहीं है बल्कि एक पूरी बिरादरी है। हर साल होने वाले तालिमी मेले में छात्रों के साथ यह बिरादरी भी बड़े जोश से भाग लेती है। १९४० में जब तालिमी मेला मनाया जाने लगा तो उसका मकसद ही आस पास की बस्ती के लोगों को विभिन्न सांस्क्रितिक कार्यक्रमों के माध्यम से तालीम देना था। जिस संघर्ष के बूते जामिया के दयार ने यह खूबसूरती हासिल की है उससे सीख मिलती है कि बड़े सपने के सकार होने के पीछे जद्दोजहद का इतिहास छिपा रहता है। १९२८ में चंद लोगों ने असहयोग आन्दोलन में अंग्रेजी तालीम का विरोध करने के मकसद से जामिया की नीव रखी। तब से अब तक के सफर के बीच वो इच्छाशक्ति हमेशा ज़िदा रही जो कभी हारती नहीं।

दीवाली
रौशन हुए दीप
घर सजे
पोस्टरों और बहुमूल्य वस्तुऒं से
सजने लगा भौतिकवादी बाज़ार।
होने लगा घमासान
व्यापार का व्यापारियों का।
एम्बेसडर या फिर
अन्य कम्पनियों के
चार पहियों से वो निकले।
और की खरीददारी।
ये संसार
लग रहा था एक बाज़ार।
जहां होता है मूल्य
बस दम चीज़ों का।
मुद्रा और वस्तु।
मानव होते हैं
नहीं होते मानव मूल्य।
और उस दिन
जब आई दीवाली
जैसे छिड़ गई हो जंग।
बज गई हो रणभेरी।
उठ रहा था धुआं धूं-धूं।
हो रहा था विस्फोट।
रोशनी तो थी ही
पर अंधेरे के सागर में
अस्तित्वहीन थी वह।
हर ऒर था धुंए का साम्राज्य।
जैसे दीवाली के आंखिरी दिन
जल गई हो मानवता।
बुझ गए हों चराग।
बारूद के जलते ही
बन गई हो मानवता
बारूद की तरह।
हो गया हो विस्फोट मानवमूल्यों पर
तेज़ और तेज़।

Friday, October 5, 2007

आधी दुनिया

मनसा, वाचा, कर्मणा...

ऐसे भी हैं लोग...
इस कालम में हम ऐसे लोगों से आपको मिलाएंगे जो अपने अपने क्षेत्र में लीक से हटकर छोटे बड़े प्रयासों से समाज को बदलने की कोशिश कर रहें हैं। ऐसे लोग जो मीडिया हाइप के लिए काम नहीं करते। जिन्हें व्यवस्था की खामियां इस क़दर कचोटती हैं कि वो इसके खिलाफ जंग का ऐलान कर देते हैं।जंग लाज़मी नहीं कि तलवारों से ही लड़ी जाय।जंग लाज़मी नहीं कि तलवारों से ही लड़ी जाय। लाजमी है विचारों की जद्दोजहद और लड़ने की हौसला।




पी साईनाथ
एक ऎसे पत्रकार जिन्होंने पत्रकारिता के असल मूल्यों के लिए काम किया कर रहे हैं। उनकी किताब 'every body loves a good draught' के हिन्दी अनुवाद 'तीसरी फ़सल' को पढ़कर आप उनके काम का एक हद तक मूल्यांकन कर सकते हैं । इस किताब में वो बताते हैं कि किस तरह देश के अलग अलग हिस्सों में अफ़सरसाही ने गांव का शोषण किया है। कैसे ग्रामीण विकास के नाम पर योजनाऒं के लिए स्वीकृत पैसे को काम होने से पहले ही हड़प लिया जाता है। गांवों के लोगों को इसकी भनक भी नहीं लगती और योजनांएं कागज़ पर तैयार सरकारी फ़ाईलों की शोभा बढ़ाती हैं। इसमें सरकार नेता अफसर सभी की मिलीभगत होती है। गांव के लोग इस सियासत को समझ नहीं पाते। कोई बिरला आवाज़ उठाता भी है तो उसकी आवाज़ कुचल दी जाती है।
गांवो में पत्रकारिता के इतने बुरे हाल हैं कि हॉकर और पत्रकार के बौद्धिक स्तर में कोई खास अन्तर नहीं है। जो कोई भी साल भर में सबसे ज़्यादा एड दे दे वही पत्रकार है। ऍसे में पत्रकारिता के जनसरोकारों से जुड़ पाने की उम्मीद भी बेमानी है।
साईनाथ ने जो मिसाल गांवो के स्तर पर पत्रकारिता करके पेश की है वो भी उस दौर में जब लोग प्रसिद्धि की भूख और ग्लैमर के चलते पत्रकारिता से जुड़ रहे हैं सचमुच प्रेरणा दायक है। मैगसेसे पुरस्कार शायद उनके लिए महत्व ना रखता हो। ऐसे और भी पत्रकार गुमनामी के अन्धेरे में जी रहे हैं जिन्हें नाम से खास मतलब नहीं है। लेकिन ऐसे लोग कम हैं। बहुत कम।

जब किसी की मां मर जाती है तो वह बालिग हो जाता है।

बुधवार को अस्मा जहांगीर जामिया में थी। उन्होंने पाकिस्तान के आन्तरिक हालातों से जामिया को रूबरू कराया। बात खासकर पाकिस्तान में वकीलों द्वारा चलाए जा रहे आन्दोलन पर केन्द्रित रही। उनका दर्द यही था कि पाकिस्तान में वकीलों पर हुए घोर अत्याचार के खिलाफ भारत का विरोध दर्ज नहीं हुआ। सुनिये उन्हीं की जबानी उनका दर्द। ये बातें हिन्दी में अनूदित करके मैं यहां दे रहा हूं।
नौ मार्च को जब पाकिस्तानी न्याय पालिका को समाप्त पज़ाय घोषित किया गया तौ यह अवैधाानिक थाा। बलूच राष्ट्रवादी‍ डाक्टर अीचर किसी को भी कभी भी बंदी बना लिया जाता। मंगलवार को वकीलों ने जो विरोध प्रदर्शन किया वाे उनकी अन्तरआत्मा की आवाज थी। लोग इस आन्दोलन में शामिल होना चाहते थे। पर वे डरे हुए थे। इस बीच काउन्सिल के अध्यक्ष का बयान आया कि सेना के शाषन में न्याय व्यवस्था कायम नहीं की जा सकती।
वकीलों के बीच फैज की लोकप्रिय पंक्तियां हम देखेंगे गूज रही थी। सैकडों की तादात में पुरूष महिलाएं सडकाें पर गाते तालियां बजाते नाच रहे थे। यह विरोध का एक अलग अन्दाज था। एक वकील ने चुटकी लेते हुए एक महिला वकील से कहा था मैडम आज खुलकर नाचिये। मौलवी आपको नहीं रोकेगा।
यह केवल उच्च वर्ग की बार एसोसिएशन का आन्दोलन नहीं था। उन वकीलों में कई एसे भी थे जिनके पास माेटरसाइकिल तक खरीदने का पैसा नहीं था। यह आन्दोलन लोकतन्त्र और न्याय के शाषन के लिए था। सक्रिय कार्यकर्ताऒं को गिरफ्तार किया जा रहा था। मीडिया को नियन्र्रित किया जा रहा था। पुलिस जितना बर्बर हो सकती थी हुई। लाठी कितनी बेदर्द हा सकती है यह मैने देखा।
बेनजीर ने मरने के पहले एक सभा में कहा था कि वह शान्ति की ऒर एक बदलाव चाहती हैं। लेकिन आलम यह है कि आत्मघाती बम ताकिस्तान के लिये खुले रहस्य की तरह हैं। उन दिनों लाउडस्पीकर में बार बार अनाउंस किया जा रहा था कि औरतें घर से बाहर ना निकलें कहीं भी आत्मघाती बम हो सकते हैं। हम हिंसा को जी रहे थे। हमें खून के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था।
यहां मीडिया की भूमिका अच्छी रही। उसने हिंसा को हाइप नहीं किया। पाकिस्तान के लोगों में मुसर्रफ की छवि एक डबल क्रोसर की बन गई है। वह कहीं भी किसी का भी छल सकता है।
चुनावों के दौरान एक वमटर की प्रति क्रिया से पाकिस्तान का दर्द समझा जा सकता है। उसने डर के माहौल में वोट डालने सम्बन्धी एक प्रश्न के कहा था जब किसी की मां मर जाती है तो वह बालिग हो जाता है।

अक्स

जीने का जज्बा


कैसे कहैं कि कोई बुरा ख्वाब नहीं है


इसे कहते हैं खूबसूरती कि इन्तहां जाने क्यों ये आंखें आज भी कुछ बोलती हैं




भीड़ की आदत नहीं है मैं अभी मासूम हूं


शब्द ही नहीं चित्र भी होते हैं विचारों का आइना

तय करो किस ओर हो.....

कई विचार....ढेरों विकल्प.....पर आपको तय करना ही होगा कि आखिर....किस ओर हैं आप

आम आदमी का स्वास्थ्य

भारतीय जनसंचार संस्थान में पत्रकारिता की पढाई कर रहे छात्र छात्राऒं के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का विषय था जनस्चास्थ्य यवं जनसंचार। जनस्वास्थ्य के तत्वावधान में आयोजित एस कार्यक्रम में जो उठाये गये वो काफी अहम थे मसलन बडे बडे अस्पतालों नर्सिंग होम अदि के बडे शहरों से लेकर छोटे शहरों तक में खुल जाने के बावजूद क्या कारण हैं कि आम आदमी के स्वास्थ्य का स्थिति अब तक नहीं सुधर पाई है। हैजा निमोनिया एनीमिया डैंगू जैसे रोगों से मरने वाले लोगों में कमी नहीं हो पा रही। यहां मीडिया की भूमिका बडी अहम हो जाती है कि बावजूद इन बत्तर हालातों के मीडिया स्वास्थ्य के मुद्दों को जगह देने को तैयार नहीं है। जगह मिल भी रही है तो फिटनेस या सेक्स सरीखे कम जरूरी मुद्दो को या फिर बडीबडी कम्पनियों द्वारा कराये जा रहे शोधों को जिनका आम आदमी की बीमारियों से कोई सरोकार ही नहीं है। आजादी के बाद जबसे वैशवीकरण ने उद्योगों की ज़मीन भारत में तैयार की हैतबसे स्वास्थ्य भी एक उद्योग के रूप में विकसित हुआ। बडे बडे अस्पताल बने। दिल्ली में १९९८ में अपोलो अस्पताल को सरकार ने इस शर्त पर हज़ारों एकड ज़मीन को १०० करोड रूपये की १५ एकड ज़मीन महज एक रूपये प्रति वर्ष की लीज पर दे दी गई किवहां कुल क्षमता का एक तिहाई गरीबों के मुफ्त इलाज़ के लिए होगा। लेकिन जानकार बताते हैं कि एसा हो नहीं रहा।

Thursday, October 4, 2007

नई सोच

ज़माना बदल रहा है।
फिर हमारी सोच क्यों न बदले
क्यों न पनपे एक नई सोच