Saturday, February 7, 2009

एक फिज़ा के बहाने


सोचा था इस मुद्दे पर कुछ नहीं लिखूंगी...क्योंकि अगर कुछ लिखा तो लोगों को बुरा लगेगा...लेकिन फिर सोचा मैं दुनिया की परवाह क्यों करूं? वैसे तो ये एक बहस भर थी...और बहस का विषय औरत हो तो क्या कहने। किसने क्या कहा ये नहीं लिखूंगी क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बस इस बहस का नतीजा क्या निकला वो भर बता देती हूं। नतीजा निकला कि १- लड़कियां घरों को तोड़ती हैं. २-आज की पढ़ी लिखी लड़कियां पैसे वाले लोगों और खास कर राजनीति से जुड़े लोगों को फंसाती हैं फिर उनसे पैसे ऐंठती हैं. ३- कामकाजी लड़कियों को ना तो ढंग से काम आता है और ना ही घर संभालना. ४- कामकाजी लड़कियां सिर्फ अपनी मुस्कान और अदाओं का खाती हैं. ५- लड़कियों का क्या है जब तक बिना कुछ किए पैसा मिल रहा है तब तक नौकरी करो नहीं तो शादी कर लो. ६-लड़कियां अपने काम को सीरियसली नहीं लेती...और अगर डांट पड़ जाए तो दो आंसू टपकाए और बात खत्म। वैसे लिस्ट और भी लंबी हो सकती है लेकिन घुमाफिरा कर थीं यही बातें। ज़ाहिर है बहस में हिस्सा लेने वाले सभी पुरुष थे। बीच-बीच में मुड़कर मेरी ओर भी देख लिया जाता था...शायद इस उम्मीद में कि मैं कुछ बोलूं। लेकिन मैं कुछ नहीं बोली...और कुछ बोलने का फायदा भी क्या था?
बात शुरु तो अनुराधा बाली, माफ कीजिए...फिज़ा मोहम्मद से हुई थी...लेकिन खत्म...खैर छोड़िये।
फिज़ा तो वैसे भी आजकल हॉट टॉपिक है...फिज़ा के बहाने लड़कियों को नैतिकता, संस्कृति और सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले राजनीति में भी हैं और मीडिया में भी। कोई लड़की धर्म बदलकर किसी शादी-शुदा आदमी के साथ शादी कर ले...लड़का भी कौन? एक पूर्व मंत्री...यहीं तक होता तो चलो मान भी लेते, दोनों खुले आम अपने प्यार का इज़हार करते घूमते हैं...मीडिया को इंटरव्यू देते फिरते हैं। अब ये बात लोगों को कैसे हज़म होगी। पहली बार जब चांद मोहम्मद और फिज़ा ने मिलकर प्रेस कांफ्रेंस की थी तो सभी न्यूज़ चैनल वालों की बाछें खिल गई कि चलो आज का मसाला मिल गया। मेरे एक सहयोगी ने तब भी कहा था यार ये तो बड़ी चालू चीज़ है। और अब जब कि फिज़ा चांद मोहम्मद की पोल पट्टी खोलने पर तुली हुई है तो मेरे वही सहयोगी बड़े गर्व से कहते हैं देखो मैने पहले ही कहा था ना बड़ी चालू चीज़ है....। हां चालू है फिज़ा क्योंकि उसने एक शादी शुदा आदमी के लिए अपना सबकुछ छोड़ दिया। हां वो चालू है क्योंकि उसने समाज से डरे बिना इस सच को स्वीकार किया। वो चालू है क्योंकि अपने धोखेबाज़ पति के पाप पर छुपकर आंसू बहाने के बजाए उसने दुनिया के सामने अपना रोना रोया। वो चालू है कि क्योंकि एक कोने में पड़े रहकर खुद को कोसने के बजाए उसने चांद मोहम्मद से ज़िम्मेदारी लेने को कहा। मैं फिज़ा की समर्थक नहीं हूं। मुझे इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि चांद मोहम्मद उसके पास वापस लौटता है या नहीं। मेरी दिलचस्पी इसमें भी नहीं है कि कौन चांद मोहम्मद की असली पत्नी है। लेकिन मैं एक औरत हूं और मुझे इस बात से फर्क पड़ता है जब फिज़ा के बहाने लोग औरतों पर फिकरे कसते हैं...मुझे फर्क पड़ता है जब नैतिकता के ठेकेदार औरतों को हद में रहने की सलाह देने लगते हैं। मुझे फर्क पड़ता है जब ऑफिस में घटिया मज़ाक के दौर चलते हैं और मेरे बगल में बैठे दो पुरुष सहयोगी एक दूसरे के कानों में कुछ फुसफुसाते हैं और एक घिनौनी सी हंसी हंसते हैं। जी हां मुझे फर्क पड़ता है जब खुद को पढ़े लिखे कहने वाला एक पत्रकार मैंगलोर में हुई लड़कियों की पिटाई को सही ठहराता है। तर्क ये कि जब कोई अपनी सीमा पार करता है तो किसी ना किसी को तो आगे आना ही होगा। तो अब आप बताएंगे हमें कि हमारी सीमा क्या है? आप समझाएंगे हमें कि हमारा चरित्र कैसा होना चाहिए? क्यों भला? आप कौन होते हैं हमारी सीमा तय करने वाले? हमारे चरित्र का ग्राफ बनाने वाले? हमने तो ये हक़ किसी को नहीं दिया। ये सिर्फ और सिर्फ हमारा अधिकार है। और अच्छा यही होगा कि कोई, मतलब कोई भी इस अधिकार में हस्तक्षेप करने की कोशिश ना करे। क्योंकि लड़कियों के ज़रा हाथ-पैर खोलते ही तुम्हारा दम फूलने लगा है। तो सोचो अगर पूरी परवाज़ ले ली तो क्या होगा?

Sunday, January 25, 2009

क्या ये आतंकवाद नहीं?


कुछ ही महीने पहले अपने एक दोस्त से मिली... बहुत दिनों बाद मुलाक़ात हुई थी...और सच कहूं तो उससे मिलकर बहुत अच्छा भी लगा। सिर्फ २ साल में ही उसने काफी तरक्की कर ली थी। मुझसे चार गुना सैलरी थी...और खर्च भी वैसा ही। .उसका नाम नहीं लिखूंगी...इसलिए नहीं क्योंकि मैं उसकी पहचान गुप्त रखना चाहती हूं...बस इसलिए कि क्योंकि आजकल मुझे अपने आसपास हर शख्स में उसका अक्श नज़र आने लगा है। तो जैसा कि आजकल होता है। हफ्ते में पांच दिन वो जमकर काम करता था और दो दिन जमकर मस्ती। लेकिन अंदर कहीं कुछ चुभ भी रहा था। मुझे लगा कि ज़िंदगी में मैं कहीं पीछे छूट गई हूं। एक बार तो ये भी सोचा कि अगर आईटी सेक्टर ज़्वाइन किया होता तो तरक्की के ज़्यादा चांसेज़ थे। लेकिन आज हालात बिल्कुल बदले हुए हैं। उसमें वो ज़िदादिली नज़र ही नहीं आती...बिल्कुल डरा हुआ, सहमा हुआ सा लगता है। जिन मदों में खर्च करने से पहले वो सोचता भी नहीं था आज वही उसे भारी लग रहे हैं। हर हफ़्ते जमने वाली महफिलें सूनी हो गई हैं। मोबाइल का बिल आधा भी नहीं रह गया है और यहां तक कि सिगरेट की लत भी लगता है छूट जाएगी। हर थोड़ी देर के बाद उसके मुंह से निकल ही जाता है कि यार इंडस्ट्री की हालत बहुत ख़राब है। यार आजकल ऑफिस में बहुत टेंशन चल रही है। न जाने कब नौकरी से हाथ धोना पड़ जाए। अपने हमेशा हंसते रहने वाले दोस्त के मुंह से ऐसी बातें सुनकर इस दुनिया पर, इस सिस्टम पर बेहद गुस्सा आता है? क्या दुनिया सिर्फ एक बाज़ार भर है? क्या इंसान सिर्फ एक मशीन भऱ है? जब तक तुम्हारा काम है तब तक इस मशीन को घिसते रहो...और जब काम निकल जाए तो उसे कबाड़ की तरह फेंक दो। आर्थिक मंदी, आर्थिक मंदी सुन-सुन कर कान पक गए हैं। ये आर्थिक मंदी कोई आसमान से तो टपकी नहीं है। दुनिया में पैसा पहले भी उतना ही था जितना कि अब है। कंपनियों के ग़लत फ़ैसले, ग़लत प्रबंधन का खामियाज़ा बेचारे वो लोग क्यों उठाएं जो अपनी दिन रात की मेहनत उस कंपनी को आगे बढ़ाने में लगा रहे हैं। तर्क कहता है कंपनी का बचना ज़्यादा ज़रूरी है तो क्या कंपनी को बचाने के लिए कर्मचारी की बलि लेना ज़रूरी है। अभी तो एक सत्यम का सच सामने आया है। कौन जाने अभी ऐसे कितने सच अंधेरे में दफ़न हैं? तो क्या हर बार जब ऐसा कोई सच सामने आएगा तो मेरा कोई दोस्त अपनी मुस्कान खो देगा? ऐसे तो एक दिन हम सब मुस्कुराना भूल जाएंगे। तब ये कंपनियां अपनी तरक्की का जश्न क्या लाशों के साथ मनाएंगी?

क्यों गर्व करूं?


क्या सर्फ इसलिए क्योंकि मैं इस देश में पैदा हुई हूं? जबकि मैं ये जानती हूं कि यहां पैदा होना या ना होना मेरी मर्ज़ी से तय नहीं हुआ
क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि इस देश की आज़ाद हवा में मैं सांस ले रही हूं? जबकि मैं जानती हूं कि मेरी सोच तक पर पाबंदी लगी है।

क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि यहीं मुझे पेट भरने को अन्न मिल रहा है? जबकि मैं जानती हूं करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं।

क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि इस देश में औरत को देवी की तरह पूजा जाता है? जबकि मैं जानती हूं पत्थर की देवी की तरह औरत को सब कुछ चुपचाप सहन करना पड़ता है।

क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारी संस्कृति सबसे महान है? जबकि मैं जानती हूं कि हमें विरासत में नफ़रत और ज़हर के अलावा कुछ नहीं मिला।

क्यो गर्व करूं मैं इस देश पर?
क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम ऐसा कहते हो?

या इसलिए क्योंकि यहां रहने के लिए यही कहना होगा।

Friday, December 12, 2008

इस कीचड़ में कब तक?


अभी जिस वक्त मैं ये लिखने बैठी हूं रात के कोई साढ़े तीन बज रहे हैं। कायदे से मुझे अभी सो जाना चाहिए। ग्यारह घंटे तक थका देने वाली शिफ्ट के बाद कोई भी यही करेगा। लेकिन मैं जानती हूं मुझे नींद नहीं आएगी। नहीं...मैं किसी प्यार-वार के चक्कर में नहीं पड़ी हूं, मेरे ऊपर घर-परिवार की ज़िम्मेदारी भी नहीं है, मैं किसी कर्ज़ के बोझ से भी नहीं दबी हूं। हां बोझ है, उस जुनून का जो मुझे पत्रकारिता में खींच के लाया, उस वादे का जो मैंने अपने आप से किया था। लेकिन परिस्थितियां हर रोज़ बद से बदतर होती जा रहीं हैं।
बचपन में डार्विन का सिद्धांत पढ़ा था, योग्यतम की उत्तरजीविता....सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट। दुनिया कुछ भी मानती रहे, मैंने हमेशा यही माना कि डार्विन का सिद्धांत जानवरों के लिए है...इंसानों के लिए नहीं। आखिर कैसे एक इंसान अपने सरवाइवल के लिए दूसरे की बलि ले सकता है? बॉयोलॉजी के सर के साथ इसको लेकर काफी बहस भी की, कुछ दलीलें उन्होंने दीं, कुछ मैंने। १२वीं की बोर्ड परीक्षा में मैंने सिर्फ इसलिए डॉर्विन के सिद्धांत की विशेषताएं नहीं लिखी क्योंकि मैं उसके सिद्धांत पर भरोसा नहीं करती थी। सर अभी भी इस बात को लेकर मुझे छेड़ते हैं लेकिन मैं कई महीनों तक इसी गर्व के साथ जीती रही कि मैंने अपनी मर्ज़ी के खिलाफ़ काम नहीं किया। तब मैं स्कूल की एक छात्रा थी, ज़िंदगी के असली सबक अब सीखने को मिल रहे हैं लेकिन अब अपनी बात कहने की वो आज़ादी नहीं है, अब अपनी मर्ज़ी से काम करने की इजाज़त नहीं है। अब मैं पत्रकार जो हूं। आज की पत्रकार। अब मुझे वही करना होगा जो मुझे कहा जाएगा, बिना ना नुकुर किए, बिना बहस किए। क्योंकि सामने मेरे सवालों का जवाब देने के लिए, मेरी आपत्तियों के निदान के लिए मेरे सर नहीं, मेरे बॉस होंगे। चार साल पहले जब हम पत्रकारिता पढ़ रहे थे उन दिनों टीवी के स्क्रीन पर जोश से भरे, आत्म विश्वास से लबरेज़ नज़र आने वाले चेहरे आज न जाने क्यों बहुत धुंधले से लगते हैं। इन साढ़े-तीन चार सालों में मुंह बंद करके अपने आस-पास के लोगों को समझने की कोशिश की लेकिन देखती क्या हूं, यहां या तो कोई कुंठित प्राणी नज़र आता है या आत्म मुग्ध जीव। परेशानी उन कुंठित लोगों से नहीं है जो बेचारे दिन रात अपनी कुर्सी बचाने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। परेशानी उन आत्म मुग्ध लोगों से है जिन्हें हर कामयाबी का सेहरा अपने सिर, और हर नाकामी का ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ने की बीमारी है। इनकी दुनिया इन्हीं से शुरू होती है और इन्हीं पर ख़त्म होती है। अब या तो आप इनके पीछे-पीछे दुम हिलाते हुए घूमिए या बेआबरू होकर कोने में बैठिए। इनके अलावा भी कुछ लोग हैं, इन सबके चेहरे एक से हैं, झुंझलाए हुए, गुस्से से भरे, मानो खुद से ही नाराज़ हों। सभी दौड़े चले जा रहे हैं, पता नहीं किस ओर....मंजिल तक पहुंचना इनका लक्ष्य नहीं है, ये तो बस दौड़ रहे हैं, इसलिए क्योंकि सामने वाला दौड़ रहा है। इस उम्मीद में कि कभी तो मौका मिलेगा लंगड़ी फंसाने का। आज भले ही सातवे आसमान पर आपका बसेरा हो लेकिन कब आपसे धरती का टुकड़ा भी छिन जाएगा कोई नहीं बता सकता। मज़े की बात तो ये है कि आपके कमज़ोर पड़ते ही सबसे पहले वो लोग आपका साथ छोड़ते हैं जिन्हें आपने अपना सबसे करीबी माना था। वैसे सच ये भी है कि कमल कीचड़ में ही खिलता है। बस इस उम्मीद में इस पत्रकारिता का दामन थामे हुए हूं कि आज नहीं तो कल कोई कमल खिलेगा ज़रूर। और शायद तब मैं एक बार फिर पूरे जोश के साथ कह सकूंगी कि डार्विन का सिद्धांत इंसानों के लिए नहीं है।

Monday, December 8, 2008

मुझे कैसे रोकोगे?


मैं एक औरत हूं....ये बात मैं कभी भूलती नहीं हूं, और कभी भूलना चाहती भी नहीं हूं। लेकिन फिर भी वो मुझे बार-बार याद दिलाते हैं कि हां तुम एक औरत हो। एक दूसरे दर्जे की प्राणी। वो मेरे प्रवाह को रोकना चाहते हैं, मुझे जंजीरों में कैद करना चाहते हैं। वो डरते हैं कि कहीं मैं उनकी बनाई सीमाओं को तोड़ ना दूं, वो घबराते हैं कि कहीं मैं उनकी पहुंच से दूर उड़ ना जाऊं। वो हर रोज़ मेरे सामने एक दीवार खड़ी करते हैं, लेकिन मैं...मैं एक ही फलांग में उस दीवार को फांद जाती हूं। वो और बड़ी दीवार चुनते हैं, लेकिन मुझे रोक पाना अब उनके बस में नहीं है। वो कहते हैं कि मैं कमज़ोर हूं। मैं इंकार कहां करती हूं? यही तो मेरी जीत है, वो मुझे कमज़ोर समझते हैं फिर भी मुझे बांध नहीं पाते। वो कुढ़ते हैं, झल्लाते हैं और फिर मुझे दबाने की कोशिश करते हैं। जब मैं चुप रहती हूं तो वो मेरी चुप्पी से डरते हैं। और जब में बोलने लगती हूं तो वो कान बंद कर लेते हैं। उनकी इस छटपटाहट को देखकर मैं हंसती हूं, मुंह दबाकर नहीं, खिलखिलाकर हंसती हूं। याद नहीं कि कब उनकी इस झल्लाहट से मुझे प्यार हुआ, शायद तब, जब पहली बार जब मुझे खुली हवा में सांस लेते देखकर उनकी सांसें रुक गई, या तब, जब अपनी बनाई ज़मीन पर मुझे अपनी सफलता के किले बनाते देख उनके पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक रही थी। ये सब कुछ हो रहा था और मैं आगे बढ़ते जा रही थी। मैं बढ़ूंगी, और आगे बढ़ूंगी और तब तक बढ़ते रहूंगी जब तक तुम मुझे आगे बढ़ने से रोकते रहोगे। कहा ना मैं औरत हूं...और इस आगे बढ़ती हुई औरत को रोक पाना अब तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं।

Saturday, December 6, 2008

मीडिया को दोष क्यों?


रात के कोई दस, सवा दस बजे का समय था जब मुंबई के कोलाबा में फायरिंग की ख़बर आई। करीब डेढ़ करोड़ लोगों का शहर है मुंबई, दिन भर में मर्डर, लूट-पाट और गोलीबारी की न जाने कितनी घटनाएं इस शहर में होती हैं। इस ख़बर को ज़्यादा फुटेज नहीं देना चाहिए। यही कहा था मेरे एक सीनियर साथी ने मुझसे। वैसे मेरी राय भी यही थी। लेकिन मुंबई का मामला था इसलिए मैंने ताज़ा ख़बर चलाकर अपनी ड्यूटी पूरी हुई मान ली। सोचा था एक-दो मिनट चला कर ख़बर उतार लेगें। वैसे भी भारत इंग्लैंड को पांचवे वनडे में भी हराने जा रहा था। वो ज़्यादा बड़ी ख़बर है, यही मानकर मैंने उस इन्फॉर्मेशन को भी लिखकर रख लिया। तभी सीएसटी से भी फायरिंग की ख़बर आई। वैसे दूसरे चैनल चार जगहों पर फायरिंग की ख़बर चला रहे थे। तभी मुंबई से अभिषेक का फोन आया और रवीश कुछ परेशान नज़र आने लगे। उन्होंने मुंबई की ख़बर को ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह चलाने को कहा। मैं इस पर कोई आपत्ति करती इससे पहले ही वो फोन थाम कर न्यूज़ रूम से बाहर निकल गए। खैर मुझसे जैसा कहा गया मैने वैसे ही किया। अब तो ख़बरों की बाढ़ सी आने लगी। यहां फायरिंग, वहां धमाका, यहां इतने मरे, वहां उतने घायल। ये क्या हो रहा है? कुछ भी साफ नहीं था। बस ख़बरें आती जा रही थीं और हम उनको ऑन-एयर भेजे जा रहे थे। हर पल एक नई ख़बर आती, और हर नई ख़बर पहले से ज़्यादा गंभीर होती जा रही थी। फिर पता चला कि मुंबई के ही नहीं, देश के ही नहीं बल्कि दुनिया के बेहतरीन होटलों में से एक ताज पर आतंकियों ने कब्ज़ा कर लिया है। कितने आतंकी हैं? उनके पास कितना विस्फोटक है? उनके इरादे क्या हैं? हम एक दूसरे से पूछ रहे थे लेकिन जवाब में बस एक शून्य ही मिलता। हां इन आतंकवादियों का मकसद बिल्कुल साफ था। वो था आतंक फैलाना। सीमा पर लड़ाइयां तो ये देश कई बार देख चुका है, देश में दंगे, धमाके, संसद पर हमला और ऐसी न जाने कितनी ही त्रासदियों से हम गुज़र चुके हैं, लेकिन देश की सीमा के अंदर ऐसे दुस्साहस से हमारा साबका इससे पहले नहीं पड़ा था। न्यूज़ रूम का वातावरण बिल्कुल बदल गया। चारों तरफ गज़ब की उत्तेजना थी, जैसे हम जंग पर जाने की तैयारी कर रहे हों। सारे मतभेद, सारी निराशा, सारी नारज़गी जाने कहां खो गई थी। सभी लोगों में जोश था, एक सहयोग की भावना थी, सिर्फ एक इच्छा कि उनके मोर्चे से कहीं कोई कमी ना रह जाए। खुद मैं, जो कुछ घंटे पहले तक कमज़ोरी की वजह से ठीक से चल नहीं पा रही थी अचानक अपने अंदर अलग ऊर्जा महसूस कर रही थी। मैं ही नहीं सभी लोग अपनी शिफ्ट के बारे में भूल चुके थे। जो लोग घर वापस चले गए थे वो वापस लौट गए थे, जो लोग वापस नहीं लौटे वो फोन करके पूछ रहे थे कि न्यूज़ रूम को उनकी ज़रूरत तो नहीं है? इस बीच एनएसजी और आर्मी को भी ऑपरेशन में शामिल करने का आदेश हो गया था। आतंक के खिलाफ़ जंग जारी थी। और ये सारी ख़बरें दर्शकों तक पहुंचाने की हमारी कोशिश भी। तुरंत कुछ लोग मुंबई रवाना हुए। इधर देश में हाइअलर्ट घोषित हुआ, वहां रिपोर्टर्स को अलर्ट कर दिया गया। क्या भूख, क्या प्यास, क्या घर और क्या परिवार न्यूज़ रूम इन सभी को भूल चुका था। लोग २४- २४ घंटे से ऑफिस में थे और ये भी पता नहीं था कि कितने घंटे और ऑफिस में रहना होगा। लेकिन क्या मजाल कि थकान किसी के आस-पास भी फटकी हो। कई घंटे यहां तक कि कई दिन गुज़र गए। ऑपरेशन ख़त्म हो गया, हमले की जांच शुरू हो गई लेकिन न्यूज़ रूम की गहमागहमी फिर भी जारी रही। यही न्यूज़ रूम का कैरेक्टर है, यही न्यूज़ रूम का मज़ा है। कुछ लोग कहते हैं जब ये हमला हुआ उस वक्त मीडिया सिर्फ सनसनी फैला रहा था। मीडिया को सिर्फ टीआरपी से मतलब है। कुछ ने तो यहां तक कहा कि न्यूज़ चैनल आतंकियों की मदद कर रहे थे। कहा जा रहा है कि ओबेरॉय में छिपे आतंकी टीवी के ज़रिए बाहर की जानकारी हासिल कर रहे थे। कुछ विदेशी नागरिक मीडिया से नाराज़ थे कि मीडिया उनकी लोकेशन टीवी पर दिखा रहा है। हां आलोचना करना हर किसी का हक़ है। और हर आलोचना का उत्तर देने का कोई मतलब भी नहीं। लेकिन फिर भी कहे बिना नहीं रहा जाता कि अगर हम इस हमले की पल-पल की रिपोर्ट ना दिखाते तो क्या करते? आखिर यही तो हमारा काम है। हो सकता है इस दौरान कोई आधी-अधूरी या ग़लत जानकारी न्यूज़ चैनलों ने दिखा दी हो, हो सकता है कुछ ऐसी सूचनाएं ऑन-एयर कर दी हों जिन्हें देशहित में छिपाया जा सकता था। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि ऐसी सिचुएशन में सबकुछ लाइव होता है। आपके पास मौका ही नहीं होता कुछ एडिट करने का, एनालिसिस करने का। जो जैसा है, वैसा ही दर्शकों के सामने रखना पड़ता है। इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, ना ही शर्मिंदा होने की कोई बात है। इसलिए मेरी गुज़ारिश है कृपया मीडिया को दोष ना दें, उसे उसका काम करने दें।

Monday, November 24, 2008

मीडिया बनाम जनस्वास्थ्य


मीडिया बनाम जनस्वास्थ्य
उमेश पंत

स्वास्थ्य एक ऐसा मुद्दा है जो भारतीय मीडिया में अछूत सी हैसियत रखता है इसीलिये एनडीटीवी इन्डिया पर स्वास्थ्य पर फीचर देखकर एकबारगी हैरानी हुई कि यह कैसे हो गया? विशेषकर हिन्दी मीडिया में यह विषय बेहद उपेक्षित है। देश में एक ओर पंचसितारा अस्पतालों के चलन ने जोर पकड़ा है। हेल्थ टूरिजम के बहाने विदेशी पर्यटक बेहतर स्वास्थ्य की उम्मीद में यहां आते हैं और हमारा देश उनकी उम्मीदों पर खरा भी उतरता है। उन्हें उनके मन माफिक माहौल और सुविधाएं मुहैय्या कराई जाती हैं और दूसरी ओर जो अपने देश के लोगों के स्वास्थ्य का आलम है वो एनडीटीवी की इस रिपोर्ट में प्ूारे दर्द और नंगी सच्चाई के रुप में बंया हो जाता है। देश की राजधनी के प््रामुख सरकारी अस्पताल लोकनायक जय प्रकाश अस्पताल में जनस्वास्थ्य की धज्जियां उड़ते देख जो दर्द होता है उस दर्द का इलाज इस अस्पताल में तो क्या प्ूारी व्यवस्था में फिलवक्त नहीं दिखाई देता। रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में जहां बच्चों की मृत्यु दर 3 दशमलव 3 प््रतिशत वहीं इस अस्पताल में आने वाले बच्चों की मृत्युदर 33 प््रातिशत के आसपास है। गन्दगी से सने अस्पताल के जो दृश्य फीचर में दिखाये गये उन्हें देख नर्क की कल्पना को साक्षात किया जा सकता है। लेकिन इस नर्क की यह हकीकत मीडिया में कभी जगह नहीं बना पाती क्योंकि उपेक्षा का दंश झेलता न वह निम्नवर्गीय आदमी स्क्रीन पर अच्छा लगता है न ही वह अस्पताल जिसे बनाया तो उसे स्वस्थ्य रखने के लिए है, लेकिन जहां रहकर सेहत का सुध्र पाना कतई असम्भव सा है।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 80 प््रतिशत प््रााथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में एक भी चिकित्सक नहीं है। ऐसे में वहां झोलाछाप डाक्टर अब भी व्यवस्था का विकल्प बने हुए हैं। दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में ओझाओं और भोपाओं के टोटकों को स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए अपनाने के सिवाय लोगों के पास कोई चारा है। आप दूर बैठे चाहे इसे अन्ध्विश्वास कहें लेकिन यही उनकी मजबूरी है।
देश में 8 प्रतिशत स्वास्थ्य केन्द्रों में एक भी डाक्टर नहीं है। जबकि 39 प्रतिशत अस्पताल बिना लैब टैक्नीशियन और 17 प्रतिशत अस्पताल बिना फार्मासिस्ट के चल रहे हैं। यह तथ्य हाल ही में जारी की गई राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की रिपोर्ट से उजागर हुए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में 6 लाख पचास हजार डाक्टर काम कर रहे हैं। भारत में औसतन 1700 लोगों पर एक डाक्टर उपलब्ध है जबकि अमेरिका में 400 लोगों पर 1 डाक्टर उपलब्ध है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित पदों में से 59 दश्मलव 4 प्रतिशत सर्जन, 45 प्रतियशत गाइनोकोलोजिस्ट और 61 दशमलव 1 प्रतिशत फिजिसिायनों के पद रिक्त पड़े हैं। शहरी गरीबों में 3 साल से कम आयु के लगभग 57 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। देश में तकरीबन 6 लाख से ज्यादा लोग हर साल टी बी की चपेट में आकर मर जाते हैं। निमोनिया हर साल 4 लाख लोगों को लील जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 2005 में 1 लाख 7 हजार माताओं की मृत्यु हो गई। नेश्नल फैमिली हैल्थ सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की हर दूसरी महिला एनीमिया की शिकार है।
स्वास्थ्य के इन बिगड़े हालातों की वजह विभिन्न ज्ञस्वास्थ्य योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार है। विश्व बैंक ने खुलासा किया है कि 1993 से 2003 तक भारत में लागू की गई विभिन्न स्वास्थ्य परियोजनाओं में 2500 करोड़ रूपये का घोटाला किया गया। भारत सरकार ने इस आरोप को स्वीकार करते हुए कहा है कि परियोजनाओं के डिजाइन, निरीक्षण और कार्यान्वयन में खामियां रही हैं।
कहने को ये महज आंकड़े हैं, आंकड़े जो पूरी तरह चर्मराई हुई देश की स्वास्थ्य सुविधओं को संज्ञान में लाने के लिए समय समय पर रिपोर्ट की शक्ल में आते हैं। ये आंकड़े कई गैर सरकारी संगठनों को अस्तित्व में बनाये रखते हैं, कई शोध्कर्ताओं को पालते हैं। लेकिन इन आंकड़ों की शक्ल कभी इतनी भयावह नहीं लगती। इन आंकड़ों पर कभी बहस नहीं होती। क्योंकि आज का दौर मीडिया एडवोकेसी का है। मीडिया जिस मुद्दे को उछाल देगा उस पर क्रिया प्रतिक्रिया और तमाम हलचलें होंगी। लेकिन न जाने क्यों यह विडम्बनाबोध हमारे मीडिया को अब तक नहीं हो पाया है कि लचर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की सूली में चढ़ाये जा रहे आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए मीडिया में जगह नहीं है। यह तय है कि जब तक मीडिया स्वास्थ्य सम्बन्ध्ी अनियमितताओं को बढ़चढ़कर उजागर नहीं करेगा, उन्हें चुनावी मुददा बनने को मजबूर नही करेगा, तब तक ना ही नेता न सरकार स्वास्थ्य सुविधओं में सुधर के लिये सक्रिय होंगे।
स्वास्थ्य के मसले पर मीडिया की नीतियों में भी खामियां हैं। मीडिया में तथ्यों के मैनिपुलेशन की प््रावृत्ति बढ़ी है। उसपर बड़ी फार्मास्यूटिकल कम्पनियों का दबाव साफ नजर आता है। एक सेमीनार में डा ए के अरूण ने बीमारियों के उन्मूलन कार्यक्रमों के नियंत्राण कार्यक्रमों में बदल जाने को चिन्ताजनक बताया। उन्होंने कहा कि मीडिया को जनता तक सही तथ्य पहुंचाने चाहिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मैंनिंगो कोक्सीमिया रोग दिल्ली में आया भी नहीं था और मीडिया में फैलाए गये भ्रम के कारण इस रोग के 50 करोड़ वैक्सीन बिक गये। मीडिया के ऐसे प्रचारों से जनता के पैसे भी व्यय होते हैं और उनमें अनावश्यक भय भी पैदा होता है।
आज स्वास्थ्य मसलों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्यों सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बद से बदतर हो रही है? क्यों ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसे अति प्रचारित सरकारी प्रयासों के सकारात्मक परिणाम धरातल पर नहीं दिखाई देते? इन परियोजनाओं के नाम पर पानी के भाव बहाया गया पैसा आंखिर कहां पचा लिया गया? और लाख टके का सवाल यह कि मीडिया में अस्पतालों के बड़े और लम्बे विज्ञापनों तो हैं लेकिन जनस्वास्थ्य के मौजूदा परिदृश्य का असल चित्राण क्यों शिरे से गायब है। कम से कम मीडिया को अपनी जवाबदेही तय करनी चाहिये। एनडीटीवी से प्रेरित होकर यदि यह मुहिम अन्य चैनलों में भी दिखाई दे पाती है तो शायद परिदृश्य में कोई बदलाव हो पाये।