Saturday, October 6, 2007

फ़लक

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पुरानी डायरी
एक दौर था जब डायरी लिखने का शौक परवान चढ़ा था। वो कोई रोज की दिनचर्या में से कुछ खास रात सोने से पहले लिखने जैसा नही था। बल्कि एक स्लैम बुक की तरह दोस्तों को अपनी डायरी दे देना। और उसमें उन लोगों का प्रोफाइल (मसलन जन्म दिन पसंद नापसंद) और कुछ शायरियां पाट दी जाती थी। लेकिन उनमें से कुछ लोगों ने लीक से हटकर कुछ आलेख लिखे। ऎसे आलेख जो जितने बार पढ़ जाएं प्रेरणा ही देते हैं।
पुरानी डायरी में सहेजे ऎसे कुछ आलेखों को यहां सहेजा है।
पुरानी डायरी के कुछ अंश-----

उमेश के लिए
२१ मई २००४ कमलेश उप्रेती
यूं तो कोई बन्धन नहीं कि ये लिखना है वो लिखना है। इसलिये खुलकर काफी चीज़ें कागज़ पर उड़ेली जा सकती हैं। डायरी लिखना एकमात्र शौक या शगल नहीं होता है। ये एक दस्तावेज भी होता है अपने वक्त का। इसमें कुछ भी अगर हम लेखते हैं वो उथला नहीं होना चाहिये।समय रहते अगर हम अपनी पुरी आदतें शिद्दत से बयान करते हैं तो हमारे भविष्य मे ये बातें जब इतिहास हो जायेंगी तो उसमें विरोधाभास नहीं होंगे। उस पर सम्भावना नहीं रहेंगी कि मिथकों का आरोपण किया जाय। किसी वक्त में अगर हम चाहते हैं कि सच्चाई लिखें तो हमें अपने आसपास की परिस्थितियां राजनैतिक सामाजिक सब पर एक सही और पैनी नज़र रखनी होगी।हम जब पढ़ते हैं सुनते हैं या किसी बाह्य माध्यम से ग्रहण करते हैं उस पर हमारी द्रिष्टि आलोचनात्मक होनी चाहिए। यही तरीका है जिससे हम किसी व्यक्ति व्यव्स्था या घटना को सही सही पहचान सकते हैं।

२७ दिसम्बर २००४ रोहित
यह डायरी लिखने से पहले मैं आगे के पन्नों में कमलेश दा का लेख पढ़ चुका हूं। सहमत हूं कि डायरी एक ठोस दस्तावेज़ बन सकती है। इसे व्यक्तिगत बनाने के नाम पर अति संकुचित कर देना ग़लत होगा। डायरी एक माधयम हो सकता है एक दूसरे को जानने का। और एक रचनात्मक बहस का माहौल तैयार किया जा सकता है। मगर ज़रूरत है कि डायरी स्लैम बुक इस तरह की चीज़ों को रूख देने का। क्योंकि जहां शून्य होता है वहीं शुरूआत होती है। प्रायोजन की दिशा में भटकाव भी होता है। ज़रूरत है एक सही दिशा देने की। एक पहल की।
हर हमेशा तर्क देने में विकल्प के प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता होती है । यदि मैं विकल्प नहीं देता हू़ तो मेरा तर्क अपने धरातल पर ठोस नहीं है। लेकिन फिर भी मैं सोचता हूं कि डायरी में जो लेखन है उसे कहीं न कहीं अति संकुचित ही कर दिया जाता है। हो सकता है मैं ग़लत हूं। अग्रलिखित मेरा लेख मेरे इस तर्क पर विकल्प का प्रस्तुतीकरण भी कर रहा है। क्योंकि डायरी लेखन भी एक रचनात्मक प्रयास ही है।

जामिया रक्से कुनाहो के तेरी ईद है आज

जामिया मिल्लिया में इन पांच दिनों बड़ी रौनक रही। आज मेला खतम हो गया तो बड़ा तो बड़ा सूनापन महसूस हो रहा है। भीड़ अक्सर परेशान करती है पर कभी कभी खुशनुमा भी मालूम होती है। खासकर इस भीड़ का हिस्सा जब युवा चेहरे हों। हंसते चहकते। २८ अक्टूबर से ३ नवम्बर जामिया में तालिमी मेला अपनी रौनक बिखेरता रहा। कभी वादविवाद कभी गाना बजाना कभी लैक्चर तो कभी थियेटर। अलग अलग तरह के ७० कार्यक्रम । किताबों खाने पीने के सामानों और जामिया के अलग अलग विभागों के स्टाल। हज़ारों की भीड़। संगीत कार्यक्रमों में की गई हूटिंग और मस्ती भरे ये पांच दिन।
जामिया केवल एक यूनिवर्सिटी का नाम नहीं है बल्कि एक पूरी बिरादरी है। हर साल होने वाले तालिमी मेले में छात्रों के साथ यह बिरादरी भी बड़े जोश से भाग लेती है। १९४० में जब तालिमी मेला मनाया जाने लगा तो उसका मकसद ही आस पास की बस्ती के लोगों को विभिन्न सांस्क्रितिक कार्यक्रमों के माध्यम से तालीम देना था। जिस संघर्ष के बूते जामिया के दयार ने यह खूबसूरती हासिल की है उससे सीख मिलती है कि बड़े सपने के सकार होने के पीछे जद्दोजहद का इतिहास छिपा रहता है। १९२८ में चंद लोगों ने असहयोग आन्दोलन में अंग्रेजी तालीम का विरोध करने के मकसद से जामिया की नीव रखी। तब से अब तक के सफर के बीच वो इच्छाशक्ति हमेशा ज़िदा रही जो कभी हारती नहीं।

दीवाली
रौशन हुए दीप
घर सजे
पोस्टरों और बहुमूल्य वस्तुऒं से
सजने लगा भौतिकवादी बाज़ार।
होने लगा घमासान
व्यापार का व्यापारियों का।
एम्बेसडर या फिर
अन्य कम्पनियों के
चार पहियों से वो निकले।
और की खरीददारी।
ये संसार
लग रहा था एक बाज़ार।
जहां होता है मूल्य
बस दम चीज़ों का।
मुद्रा और वस्तु।
मानव होते हैं
नहीं होते मानव मूल्य।
और उस दिन
जब आई दीवाली
जैसे छिड़ गई हो जंग।
बज गई हो रणभेरी।
उठ रहा था धुआं धूं-धूं।
हो रहा था विस्फोट।
रोशनी तो थी ही
पर अंधेरे के सागर में
अस्तित्वहीन थी वह।
हर ऒर था धुंए का साम्राज्य।
जैसे दीवाली के आंखिरी दिन
जल गई हो मानवता।
बुझ गए हों चराग।
बारूद के जलते ही
बन गई हो मानवता
बारूद की तरह।
हो गया हो विस्फोट मानवमूल्यों पर
तेज़ और तेज़।

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